न जायते म्रियते वा विपश्चि-
न्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित्।
अजो नित्य: शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥ १८॥
विपश्चित् =नित्य ज्ञानस्वरूप आत्मा; न जायते=न तो जन्मता है; वा न म्रियते=और न मरता ही है; अयम् न=यह न तो स्वयं; कुतश्चित् =किसीसे हुआ है; [न=न] (इससे); कश्चित् =कोई भी; बभूव=हुआ है अर्थात् यह न तो किसीका कार्य है और न कारण ही है; अयम्=यह; अज:=अजन्मा; नित्य:=नित्य; शाश्वत:=सदा एकरस रहनेवाला (और); पुराण:=पुरातन है अर्थात् क्षय और वृद्धिसे रहित है; शरीरे हन्यमाने=शरीरके नाश किये जानेपर भी (इसका); न हन्यते=नाश नहीं किया जा सकता*॥ १८॥
* गीतामें इस मन्त्रके भावको इस प्रकार समझाया गया है—
न जायते म्रियते वा कदाचि-
न्नायं भूत्वा भविता वा न भूय:।
अजो नित्य: शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥ (२। २०)
‘यह आत्मा किसी भी कालमें न तो जन्मता है और न मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होनेवाला ही है; क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है; शरीरके मारे जानेपर भी यह नहीं मारा जाता।’
(See Next Verse for Commentary)