अन्यत्र धर्मादन्यत्रा-
धर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात्।
अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च
यत्तत्पश्यसि तद्वद॥ १४॥
यत् तत्=जिस उस परमेश्वरको; धर्मात् अन्यत्र=धर्मसे अतीत; अधर्मात् अन्यत्र=अधर्मसे भी अतीत; च=तथा; अस्मात् कृताकृतात्=इस कार्य और कारणरूप सम्पूर्ण जगत्से भी; अन्यत्र=भिन्न; च=और; भूतात् भव्यात्=भूत, वर्तमान एवं भविष्यत् —तीनों कालोंसे तथा इनसे सम्बन्धित पदार्थोंसे भी; अन्यत्र=पृथक्; पश्यसि=(आप) जानते हैं; तत् =उसे; वद=बतलाइये॥ १४॥
व्याख्या—नचिकेता कहता है—भगवन्! आप यदि मुझपर प्रसन्न हैं तो धर्म और अधर्मके सम्बन्धसे रहित, कार्य-कारणरूप प्रकृतिसे पृथक् एवं भूत, वर्तमान और भविष्यत् —इन सबसे भिन्न जिस परमात्मतत्त्वको आप जानते हैं, उसे मुझको बतलाइये*॥ १४॥
* भाष्यकार श्रीशङ्कराचार्यजीने इस प्रकरणको भी अपने ब्रह्मसूत्रभाष्यमें परमेश्वरविषयक ही माना है (‘पृष्टं चेह ब्रह्म’—देखिये ब्रह्मसूत्र अध्याय १ पा० ३ के २४ वें सूत्रका भाष्य)।
सम्बन्ध—नचिकेताके इस प्रकार पूछनेपर यमराज उस ब्रह्मतत्त्वके वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा करते हुए उपदेश आरम्भ करते हैं—