अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथापरे।
सस्यमिव मर्त्य: पच्यते सस्यमिवाजायते पुन:॥ ६॥
पूर्वे=आपके पूर्वज पितामह आदि; यथा=जिस प्रकारका आचरण करते आये हैं; अनुपश्य=उसपर विचार कीजिये (और); अपरे=(वर्तमानमें भी) दूसरे श्रेष्ठ लोग; [यथा=जैसा आचरण कर रहे हैं;] तथा प्रतिपश्य=उसपर भी दृष्टिपात कर लीजिये (फिर आप अपने कर्तव्यका निश्चय कीजिये); मर्त्य:=(यह) मरणधर्मा मनुष्य; सस्यम् इव=अनाजकी तरह; पच्यते=पकता है अर्थात् जराजीर्ण होकर मर जाता है (तथा); सस्यम् इव=अनाजकी भाँति ही; पुन:=फिर; आजायते=उत्पन्न हो जाता है॥ ६॥
व्याख्या—पिताजी! अपने पितामहादि पूर्वजोंका आचरण देखिये और इस समयके दूसरे श्रेष्ठ पुरुषोंका आचरण देखिये। उनके चरित्रमें न कभी पहले असत्य था, न अब है। असाधु मनुष्य ही असत्यका आचरण किया करते हैं; परंतु उस असत्यसे कोई अजर-अमर नहीं हो सकता। मनुष्य मरणधर्मा है। यह अनाजकी भाँति जरा-जीर्ण होकर मर जाता है और अनाजकी भाँति ही कर्मवश पुन: जन्म ले लेता है॥ ६॥
सम्बन्ध—अतएव इस अनित्य जीवनके लिये मनुष्यको कभी कर्तव्यका त्याग करके मिथ्या आचरण नहीं करना चाहिये। आप शोकका त्याग कीजिये और अपने सत्यका पालनकर मुझे मृत्यु (यमराज)-के पास जानेकी अनुमति दीजिये। पुत्रके वचन सुनकर उद्दालकको दु:ख हुआ; परंतु नचिकेताकी सत्यपरायणता देखकर उन्होंने उसे यमराजके पास भेज दिया। नचिकेताको यमसदन पहुँचनेपर पता लगा कि यमराज कहीं बाहर गये हुए हैं; अतएव नचिकेता तीन दिनोंतक अन्न-जल ग्रहण किये बिना ही यमराजकी प्रतीक्षा करता रहा। यमराजके लौटनेपर उनकी पत्नीने कहा—