स होवाच पितरं तत कस्मै मां दास्यसीति। द्वितीयं तृतीयं तॸ होवाच मृत्यवे त्वा ददामीति॥ ४॥
स: ह=यह सोचकर वह; पितरम्=अपने पितासे; उवाच=बोला कि; तत (तात)=हे प्यारे पिताजी! आप; माम्=मुझे; कस्मै=किसको; दास्यसि इति=देंगे?; (उत्तर न मिलनेपर उसने वही बात) द्वितीयम्=दुबारा; तृतीयम्=तिबारा (कही); तम् ह=(तब पिताने) उससे; उवाच=(क्रोधपूर्वक इस प्रकार) कहा; त्वा=तुझे (मैं); मृत्यवे=मृत्युको; ददामि इति=देता हूँ॥ ४॥
व्याख्या—यह निश्चय करके उसने अपने पितासे कहा—‘पिताजी! मैं भी तो आपका धन हूँ, आप मुझे किसको देते हैं?’ पिताने कोई उत्तर नहीं दिया; तब नचिकेताने फिर कहा—‘पिताजी! मुझे किसको देते हैं?’ पिताने इस बार भी उपेक्षा की। पर धर्मभीरु और पुत्रका कर्तव्य जाननेवाले नचिकेतासे नहीं रहा गया। उसने तीसरी बार फिर वही कहा—‘पिताजी! आप मुझे किसको देते हैं?’ अब ऋषिको क्रोध आ गया और उन्होंने आवेशमें आकर कहा—‘तुझे देता हूँ मृत्युको!’॥ ४॥