तॸह कुमारॸ सन्तं दक्षिणासु नीयमानासु श्रद्धाऽऽविवेश सोऽमन्यत॥ २॥
दक्षिणासु नीयमानासु=(जिस समय ब्राह्मणोंको) दक्षिणाके रूपमें देनेके लिये (गौएँ) लायी जा रही थीं, उस समय; कुमारम्=छोटा बालक; सन्तम्=होनेपर भी; तम् ह=उस (नचिकेता) में; श्रद्धा=श्रद्धा (आस्तिक बुद्धि) का; आविवेश=आवेश हो गया (और); स:=(उन जराजीर्ण गायोंको देखकर) वह; अमन्यत=विचार करने लगा॥ २॥
व्याख्या—उस समय गो-धन ही प्रधान धन था और वाजश्रवस उद्दालकके घरमें इस धनकी प्रचुरता थी। होता, अध्वर्यु, ब्रह्मा और उद्गाता—ये चार प्रधान ऋत्विज होते हैं; ऐसा माना गया है कि इनको सबसे अधिक गौएँ दी जाती हैं। प्रशास्ता, प्रतिप्रस्थाता, ब्राह्मणाच्छंसी और प्रस्तोता—इन चार गौण ऋत्विजोंको मुख्य ऋत्विजोंकी अपेक्षा आधी; अच्छावाक, नेष्टा, आग्नीध्र और प्रतिहर्ता—इन चार गौण ऋत्विजोंको मुख्य ऋत्विजोंकी अपेक्षा तिहाई एवं ग्रावस्तुत, नेता, होता और सुब्रह्मण्य—इन चार गौण ऋत्विजोंको मुख्य ऋत्विजोंकी अपेक्षा चौथाई गौएँ दी जाती हैं। नियमानुसार जब इन सबको दक्षिणाके रूपमें देनेके लिये गौएँ लायी जा रही थीं, उस समय बालक नचिकेताने उनको देख लिया। उनकी दयनीय दशा देखते ही उसके निर्मल अन्त:करणमें श्रद्धा—आस्तिकताने प्रवेश किया और वह सोचने लगा—॥ २॥
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पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रिया:।
अनन्दा नाम ते लोकास्तान् स गच्छति ता ददत्॥ ३॥
पीतोदका:=जो (अन्तिम बार) जल पी चुकी हैं; जग्धतृणा:=जिनका घास खाना समाप्त हो गया है; दुग्धदोहा:=जिनका दूध (अन्तिम बार) दुह लिया गया है; निरिन्द्रिया:=जिनकी इन्द्रियाँ नष्ट हो चुकी हैं; ता:=ऐसी (निरर्थक, मरणासन्न) गौओंको; ददत्=देनेवाला; स:=वह दाता (तो); ते लोका:=वे (शूकर-कूकरादि नीच योनियाँ और नरकादि) लोक; अनन्दा:=जो सब प्रकारके सुखोंसे शून्य; नाम=प्रसिद्ध हैं; तान्=उनको; गच्छति=प्राप्त होता है (अत: पिताजीको सावधान करना चाहिये)॥ ३॥
व्याख्या—पिताजी ये कैसी गौएँ दक्षिणामें दे रहे हैं! अब इनमें न तो झुककर जल पीनेकी शक्ति रही है, न इनके मुखमें घास चबानेके लिये दाँत ही रह गये हैं और न इनके स्तनोंमें तनिक-सा दूध ही बचा है। अधिक क्या, इनकी तो इन्द्रियाँ भी निश्चेष्ट हो चुकी हैं—इनमें गर्भधारण करनेतककी भी सामर्थ्य नहीं है! भला, ऐसी निरर्थक और मृत्युके समीप पहुँची हुई गौएँ जिन ब्राह्मणोंके घर जायँगी, उनको दु:खके सिवा ये और क्या देंगी? दान तो उसी वस्तुका करना चाहिये, जो अपनेको सुख देनेवाली हो, प्रिय हो और उपयोगी हो तथा वह जिनको दी जाय, उन्हें भी सुख और लाभ पहुँचानेवाली हो। दु:खदायिनी अनुपयोगी वस्तुओंको दानके नामपर देना तो दानके व्याजसे अपनी विपद् टालना है और दान ग्रहण करनेवालोंको धोखा देना है। इस प्रकारके दानसे दाताको वे नीच योनियाँ और नरकादि लोक मिलते हैं जिनमें सुखका कहीं लेश भी नहीं है। पिताजी इस दानसे क्या सुख पायेंगे? यह तो यज्ञमें वैगुण्य है, जो इन्होंने सर्वस्व-दानरूपी यज्ञ करके भी उपयोगी गौओंको मेरे नामपर रख लिया है; और सर्वस्वमें तो मैं भी हूँ, मुझको तो इन्होंने दानमें दिया नहीं। पर मैं इनका पुत्र हूँ, अतएव मैं पिताजीको इस अनिष्टकारी परिणामसे बचानेके लिये अपना बलिदान कर दूँगा। यही मेरा धर्म है॥ ३॥