अजीर्यताममृतानामुपेत्य
जीर्यन् मर्त्य: क्वध:स्थ: प्रजानन्।
अभिध्यायन् वर्णरतिप्रमोदा-
नतिदीर्घे जीविते को रमेत॥ २८॥
जीर्यन् मर्त्य:=यह मनुष्य जीर्ण होनेवाला और मरणधर्मा है; प्रजानन्=इस तत्त्वको भलीभाँति समझनेवाला; क्वध:स्थ:=मनुष्यलोकका निवासी; क:=कौन (ऐसा) मनुष्य है (जो कि); अजीर्यताम्=बुढ़ापेसे रहित; अमृतानाम्=न मरनेवाले (आप-सदृश) महात्माओंका; उपेत्य=सङ्ग पाकर भी; वर्णरतिप्रमोदान्=(स्त्रियोंके) सौन्दर्य, क्रीडा और आमोद-प्रमोदका; अभिध्यायन्=बार-बार चिन्तन करता हुआ; अतिदीर्घे=बहुत कालतक; जीविते=जीवित रहनेमें; रमेत=प्रेम करेगा?॥ २८॥
व्याख्या—हे यमराज! आप ही बताइये—भला, आप-सरीखे अजर-अमर महात्मा देवताओंका दुर्लभ एवं अमोघ सङ्ग प्राप्त करके मृत्युलोकका जरा-मरणशील ऐसा कौन बुद्धिमान् मनुष्य होगा जो स्त्रियोंके सौन्दर्य, क्रीडा और आमोद-प्रमोदमें आसक्त होकर उनकी ओर दृष्टिपात करेगा और इस लोकमें दीर्घकालतक जीवित रहनेमें आनन्द मानेगा?॥ २८॥