त्रिणाचिकेतस्त्रिभिरेत्य संधिं
त्रिकर्मकृत् तरति जन्ममृत्यू।
ब्रह्मजज्ञं देवमीडॺं विदित्वा
निचाय्येमाॸशान्तिमत्यन्तमेति॥ १७॥
त्रिणाचिकेत:=इस (अग्निका शास्त्रोक्त रीतिसे) तीन बार अनुष्ठान करनेवाला; त्रिभि: संधिम् एत्य=तीनों (ऋक्, साम, यजुर्वेद)-के साथ सम्बन्ध जोड़कर; त्रिकर्मकृत्=यज्ञ, दान और तपरूप तीनों कर्मोंको निष्काम-भावसे करता रहनेवाला मनुष्य; जन्ममृत्यू तरति=जन्म-मृत्युसे तर जाता है; ब्रह्मजज्ञम्=(वह) ब्रह्मासे उत्पन्न सृष्टिके जाननेवाले; ईडॺम् देवम्=स्तवनीय इस अग्निदेवको; विदित्वा=जानकर तथा; निचाय्य=इसका निष्कामभावसे चयन करके; इमाम् अत्यन्तम् शान्तिम् एति=इस अनन्त शान्तिको पा जाता है (जो मुझको प्राप्त है)॥ १७॥
व्याख्या—इस अग्निका तीन बार अनुष्ठान करनेवाला पुरुष ऋक्, यजु:, साम—तीनों वेदोंसे सम्बन्ध जोड़कर तीनों वेदोंके तत्त्व-रहस्यमें निष्णात होकर, निष्कामभावसे यज्ञ, दान और तपरूप तीनों कर्मोंको करता हुआ जन्म-मृत्युसे तर जाता है। वह ब्रह्मासे उत्पन्न सृष्टिको जाननेवाले स्तवनीय इस अग्निदेवको भलीभाँति जानकर इसका निष्कामभावसे चयन करके उस अनन्त शान्तिको प्राप्त हो जाता है, जो मुझको प्राप्त है॥ १७॥