लोकादिमग्निं तमुवाच तस्मै
या इष्टका यावतीर्वा यथा वा।
स चापि तत्प्रत्यवदद्यथोक्त-
मथास्य मृत्यु: पुनरेवाह तुष्ट:॥ १५॥
तम् लोकादिम्=उस स्वर्गलोककी कारणरूपा; अग्निम्=अग्निविद्याका; तस्मै उवाच=उस नचिकेताको उपदेश दिया; या: वा यावती:=उसमें कुण्ड-निर्माण आदिके लिये जो-जो और जितनी; इष्टका:=ईंटें आदि आवश्यक होती हैं; वा यथा=तथा जिस प्रकार उनका चयन किया जाता है (वे सब बातें भी बतायीं); च स: अपि=तथा उस नचिकेताने भी; तत् यथोक्तम्=वह जैसा सुना था, ठीक उसी प्रकार समझकर; प्रत्यवदत् =यमराजको पुन: सुना दिया; अथ=उसके बाद; मृत्यु: अस्य तुष्ट:=यमराज उसपर संतुष्ट होकर; पुन: एव आह=फिर बोले—॥ १५॥
व्याख्या—उपर्युक्त प्रकारसे अग्निविद्याकी महत्ता और गोपनीयता बतलाकर यमराजने स्वर्गलोककी कारणरूपा अग्निविद्याका रहस्य नचिकेताको समझाया। अग्निके लिये कुण्ड-निर्माणादिमें किस आकारकी, कैसी और कितनी ईंटें चाहिये एवं अग्निका चयन किस प्रकार किया जाना चाहिये—यह सब भलीभाँति समझाया। तदनन्तर नचिकेताकी बुद्धि तथा स्मृतिकी परीक्षाके लिये यमराजने नचिकेतासे पूछा कि तुमने जो कुछ समझा हो, वह मुझे सुनाओ। तीक्ष्णबुद्धि नचिकेताने सुनकर जैसा यथार्थ समझा था, सब ज्यों-का-त्यों सुना दिया। यमराज उसकी विलक्षण स्मृति और प्रतिभाको देखकर बड़े ही प्रसन्न हुए और बोले॥ १५॥