शान्तसंकल्प: सुमना यथा स्याद्
वीतमन्युर्गौतमो माभि मृत्यो।
त्वत्प्रसृष्टं माभिवदेत्प्रतीत
एतत्त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे॥ १०॥
मृत्यो=हे मृत्युदेव; यथा=जिस प्रकार; गौतम:=(मेरे पिता) गौतमवंशीय उद्दालक; मा अभि=मेरे प्रति; शान्तसंकल्प:=शान्त संकल्पवाले; सुमना:=प्रसन्नचित्त (और); वीतमन्यु:=क्रोध एवं खेदसे रहित; स्यात्=हो जायँ (तथा); त्वत्प्रसृष्टम्=आपके द्वारा वापस भेजा जानेपर जब मैं उनके पास जाऊँ तो; मा प्रतीत:=वे मुझपर विश्वास करके (यह वही मेरा पुत्र नचिकेता है, ऐसा भाव रखकर); अभिवदेत् =मेरे साथ प्रेमपूर्वक बातचीत करें; एतत्=यह; (मैं) त्रयाणाम्=अपने तीनों वरोंमेंसे; प्रथमम् वरम्=पहला वर; वृणे=माँगता हूँ॥ १०॥
व्याख्या—मृत्युदेव! तीन वरोंमेंसे मैं प्रथम वर यही माँगता हूँ कि मेरे गौतमवंशीय पिता उद्दालक, जो क्रोधके आवेशमें मुझे आपके पास भेजकर अब अशान्त और दु:खी हो रहे हैं, मेरे प्रति क्रोधरहित, शान्तचित्त और सर्वथा संतुष्ट हो जायँ तथा आपके द्वारा अनुमति पाकर जब मैं घर जाऊँ, तब वे मुझे अपने पुत्र नचिकेताके रूपमें पहचानकर मेरे साथ पूर्ववत् बड़े स्नेहसे बातचीत करें॥ १०॥
सम्बन्ध—यमराजने कहा—