कविं पुराणमनुशासितार-
मणोरणीयांसमनुस्मरेद्य:।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप-
मादित्यवर्णं तमस: परस्तात्॥
प्रयाणकाले मनसाचलेन
भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्
स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्॥
कविम्, पुराणम्, अनुशासितारम्, अणो:, अणीयांसम्,
अनुस्मरेत्, य:, सर्वस्य, धातारम्, अचिन्त्यरूपम्, आदित्यवर्णम्, तमस:, परस्तात्॥ ९॥
प्रयाणकाले, मनसा, अचलेन, भक्त्या, युक्त:, योगबलेन,
च, एव, भ्रुवो:, मध्ये, प्राणम्, आवेश्य, सम्यक्, स:, तम्, परम्, पुरुषम्, उपैति, दिव्यम्॥ १०॥
य: = जो पुरुष, कविम् = सर्वज्ञ, पुराणम् = अनादि, अनुशासितारम् = सबके नियन्ता,* अणो: अणीयांसम् = सूक्ष्मसे भी अति सूक्ष्म, सर्वस्य = सबके, धातारम् = धारण-पोषण करनेवाले, अचिन्त्यरूपम् = अचिन्त्यस्वरूप, आदित्यवर्णम् = सूर्यके सदृश नित्य चेतन प्रकाशरूप (और), तमस: = अविद्यासे, परस्तात् = अति परे शुद्ध सच्चिदानन्दघन परमेश्वरका, अनुस्मरेत् = स्मरण करता है।
स: = वह, भक्त्या युक्त: = भक्तियुक्त पुरुष, प्रयाणकाले = अन्तकालमें (भी), योगबलेन = योगबलसे, भ्रुवो: = भृकुटीके, मध्ये = मध्यमें, प्राणम् = प्राणको, सम्यक् = अच्छी प्रकार, आवेश्य = स्थापित करके, च = फिर, अचलेन = निश्चल, मनसा = मनसे, स्मरन् = स्मरण करता हुआ, तम् = उस, दिव्यम् = दिव्यरूप, परम् = परम, पुरुषम् = पुरुष परमात्माको, एव = ही, उपैति = प्राप्त होता है।
‘वह त्रिकालदर्शी, पुरातन, महान् शासक, एक परमाणु से भी सूक्ष्म, सब का पालनकर्ता, जिसका रूप अग्राह्य है, जो सूर्य की भाँति स्व प्रकाशित है, और जो माया के अन्धकार से परे है, वह, जो इस प्रकार से उस पर मृत्यु के समय, भक्तिपूर्वक, मन को स्थिर रखते हुए, और योग की शक्ति के द्वारा, भूमध्य में समस्त प्राणों को स्थिर रखते हुए ध्यान करता है, ऐसा व्यक्ति सर्वोच्च देदीप्यमान पुरुषको प्राप्त होता है’।
।।8.9।। व्याख्या–‘कविम्’– सम्पूर्ण प्राणियोंको और उनके सम्पूर्ण शुभाशुभ कर्मोंको जाननेवाले होनेसे उन परमात्माका नाम ‘कवि’ अर्थात् सर्वज्ञ है।
‘पुराणम्’–वे परमात्मा सबके आदि होनेसे ‘पुराण’ कहे जाते हैं।’अनुशासितारम्’– हम देखते हैं तो नेत्रोंसे देखते हैं। नेत्रोंके ऊपर मन शासन करता है, मनके ऊपर बुद्धि और बुद्धिके ऊपर ‘अहम्’ शासन करता है तथा ‘अहम्’ के ऊपर भी जो शासन करता है, जो सबका आश्रय, प्रकाशक और प्रेरक है, वह (परमात्मा) ‘अनुशासिता’ है।दूसरा भाव यह है कि जीवोंका कर्म करनेका जैसा-जैसा स्वभाव बना है, उसके अनुसार ही परमात्मा (वेद, शास्त्र, गुरु, सन्त आदिके द्वारा) कर्तव्य-कर्म करनेकी आज्ञा देते हैं और मनुष्योंके पुराने पाप-पुण्यरूप,कर्मोंके अनुसार अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति भेजकर उन मनुष्योंको शुद्ध, निर्मल बनाते हैं। इस प्रकार मनुष्योंके लिये कर्तव्य-अकर्तव्यका विधान करनेवाले और मनुष्योंके पाप-पुण्यरूप पुराने कर्मोंका (फल देकर) नाश करनेवाले होनेसे परमात्मा ‘अनुशासिता’ है।
‘अणोरणीयांसम्’–परमात्मा परमाणुसे भी अत्यन्त सूक्ष्म हैं। तात्पर्य है कि परमात्मा मन-बुद्धिके विषय नहीं हैं; मन-बुद्धि आदि उनको पकड़ नहीं पाते। मन-बुद्धि तो प्रकृतिका कार्य होनेसे प्रकृतिको भी पकड़ नहीं पाते, फिर परमात्मा तो उस प्रकृतिसे भी अत्यन्त परे हैं! अतः वे परमात्मा सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म हैं अर्थात् सूक्ष्मताकी अन्तिम सीमा हैं।
‘सर्वस्य धातारम्’ — परमात्मा अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंको धारण करनेवाले हैं, उनका पोषण करनेवाले हैं। उन सभीको परमात्मासे ही सत्ता-स्फूर्ति मिलती है। अतः वे परमात्मा सबका धारण-पोषण करनेवाले कहे जाते हैं।’तमसः परस्तात्’–परमात्मा अज्ञानसे अत्यन्त परे हैं, अज्ञानसे सर्वथा रहित हैं। उनमें लेशमात्र भी अज्ञान नहीं है, प्रत्युत वे अज्ञानके भी प्रकाशक हैं।’आदित्यवर्णम्’–उन परमात्माका वर्ण सूर्यके समान है अर्थात् वे सूर्यके समान सबको मन-बुद्धि आदिको प्रकाशित करनेवाले हैं। उन्हींसे सबको प्रकाश मिलता है।
‘अचिन्त्यरूपम्’–उन परमात्माका स्वरूप अचिन्त्य है अर्थात् वे मन-बुद्धि आदिके चिन्तनका विषय नहीं हैं।’अनुस्मरेत्’–सर्वज्ञ, अनादि, सबके शासक, परमाणुसे भी अत्यन्त सूक्ष्म, सबका धारण-पोषण करनेवाले, अज्ञानसे अत्यन्त परे और सबको प्रकाशित करनेवाले सगुण-निराकार परमात्माके चिन्तनके लिये यहाँ ‘अनुस्मरेत्’ पद आया है।
यहाँ ‘अनुस्मरेत्’ कहनेका तात्पर्य है कि प्राणिमात्र उन परमात्माकी जानकारीमें हैं; उनकी जानकारीके बाहर कुछ है ही नहीं अर्थात् उन परमात्माको सबका स्मरण है, अब उस स्मरणके बाद मनुष्य उन परमात्माको याद कर ले।
यहाँ शङ्का होती है कि जो अचिन्त्य है, उसका स्मरण कैसे करें? इसका समाधान है कि ‘वह परमात्मतत्त्व चिन्तनमें नहीं आता’–ऐसी दृढ़ धारणा ही अचिन्त्य परमात्माका चिन्तन है।
सम्बन्ध —अब अन्तकालके चिन्तनके अनुसार गति बताते हैं।
।।8.10।। व्याख्या —प्रयाणकाले मनसाचलेन ৷৷. स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्–यहाँ भक्ति नाम प्रियताका है; क्योंकि उस तत्त्वमें प्रियता (आकर्षण) होनेसे ही मन अचल होता है। वह भक्ति अर्थात् प्रियता स्वयंसे होती है, मन-बुद्धि आदिसे नहीं। अन्तकालमें कवि, पुराण, अनुशासिता आदि विशेषणोंसे (पीछेके श्लोकमें) कहे हुए सगुण-निराकार परमात्मामें भक्तियुक्त मनुष्यका मन स्थिर हो जाना अर्थात् सगुण-निराकार-स्वरूपमें आदरपूर्वक दृढ़ हो जाना ही मनका अचल होना है।पहले प्राणायामके द्वारा प्राणोंको रोकनेका जो अधिकार प्राप्त किया है, उसका नाम ‘योगबल’ है। उस योगबलके द्वारा दोनों भ्रुवोंके मध्यभागमें स्थित जो द्विदल चक्र है, उसमें स्थित सुषुम्णा नाड़ीमें प्राणोंका,अच्छी तरहसे प्रवेश करके वह (शऱीर छोड़कर दसवें द्वारसे होकर) दिव्य परम पुरुषको प्राप्त हो जाता है।
‘तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्’ पदोंका तात्पर्य है कि जिस परमात्मतत्त्वका पीछेके (नवें) श्लोकमें वर्णन हुआ है, उसी दिव्य परम सगुण-निराकार परमात्माको वह प्राप्त हो जाता है।आठवें श्लोकमें जो बात कही गयी थी, उसीको नवें और दसवें श्लोकमें विस्तारसे कहकर इन तीन श्लोकोंके प्रकरणका उपसंहार किया गया है।इस प्रकरणमें सगुण-निराकार परमात्माकी उपासनाका वर्णन है। इस उपासनामें अभ्यासकी आवश्यकता है। प्राणायामपूर्वक मनको उस परमात्मामें लगानेका नाम अभ्यास है। यह अभ्यास अणिमा, महिमा आदि सिद्धि प्राप्त करनेके लिये नहीं है, प्रत्युत केवल परमात्मतत्त्वको प्राप्त करनेके लिये है। ऐसा अभ्यास करते हुए प्राणों और मनपर ऐसा अधिकार प्राप्त कर ले कि जब चाहे प्राणोंको रोक ले और मनको जब चाहे तभी तथा जहाँ चाहे वहीं लगा ले। जो ऐसा अधिकार प्राप्त कर लेता है, वही अन्तकालमें प्राणोंको सुषुम्णा नाड़ीमें प्रविष्ट कर सकता है। कारण कि जब अभ्यासकालमें भी मनको संसारसे हटाकर परमात्मामें लगानेमें साधकको कठिनताका, असमर्थताका अनुभव होता है तब अन्तकाल-जैसे कठिन समयमें मनको लगाना साधारण आदमीका काम नहीं है। जिसके पास पहलेसे योगबल है, वही अन्तसमयमें मनको परमात्मामें लगा सकता है और प्राणोंका सुषुम्णा नाड़ीमें प्रवेश करा सकता है।साधक पहले यह निश्चय कर ले कि अज्ञानसे अत्यन्त परे, सबसे अतीत जो परमात्मतत्त्व है, वह सबका प्रकाशक, सबका आधार और सबको सत्ता-स्फूर्ति देनेवाला निर्विकार तत्त्व है। उस तत्त्वमें ही प्रियता होनी चाहिये, मनका आकर्षण होना चाहिये, फिर उसमें स्वाभाविक मन लगेगा।
सम्बन्ध–अब भगवान् आगेके श्लोकमें निर्गुणनिराकारकी प्राप्तिके उपायका उपक्रम करते हैं।