पुण्यो गन्ध: पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ।
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु॥
पुण्य:, गन्ध:, पृथिव्याम्, च, तेज:, च, अस्मि, विभावसौ,
जीवनम्, सर्वभूतेषु, तप:, च, अस्मि, तपस्विषु॥ ९॥
पृथिव्याम् = पृथ्वीमें, पुण्य: = पवित्र, गन्ध: = गन्ध*, च = और, विभावसौ = अग्निमें, तेज: = तेज, अस्मि = हूँ, च = तथा, सर्वभूतेषु = सम्पूर्ण भूतोंमें (उनका), जीवनम् = जीवन (हूँ), च = और, तपस्विषु = तपस्वियोंमें, तप: = तप, अस्मि = हूँ।
‘मैं भूमि में मधुर गंध हूँ, अग्नि का तेज हूँ; सभी जीवों में जीवन हूँ, और तपस्वियों में तप हूँ’।
।।7.9।। व्याख्या–‘पुण्यो गन्धः पृथिव्याम्’–पृथ्वी गन्ध-तन्मात्रासे उत्पन्न होती है, गन्ध-तन्मात्रारूपसे रहती है और गन्ध-तन्मात्रामें ही लीन होती है। तात्पर्य है कि गन्धके बिना पृथ्वी कुछ नहीं है। भगवान् कहते हैं कि पृथ्वीमें वह पवित्र गन्ध मैं हूँ।यहाँ गन्धके साथ पुण्यः’विशेषण देनेका तात्पर्य है कि गन्धमात्र पृथ्वीमें रहती है। उसमें पुण्य अर्थात् पवित्र गन्ध तो पृथ्वीमें स्वाभाविक रहती है, पर दुर्गन्ध किसी विकृतिसे प्रकट होती है।
‘तेजश्चास्मि विभावसौ’–तेज रूप-तन्मात्रासे प्रकट होता है, उसीमें रहता है और अन्तमें उसीमें लीन हो जाता है। अग्निमें तेज ही तत्त्व है। तेजके बिना अग्नि निस्तत्त्व है, कुछ नहीं है। वह तेज मैं ही हूँ।
‘जीवनं सर्वभूतेषु’–सम्पूर्ण प्राणियोंमें एक जीवनीशक्ति है, प्राणशक्ति है, जिससे सब जी रहे हैं। उस प्राणशक्तिसे वे प्राणी कहलाते हैं। प्राणशक्तिके बिना उनमें प्राणिपना कुछ नहीं है। प्राणशक्तिके कारण गाढ़ नींदमें सोता हुआ आदमी भी मुर्दे-से विलक्षण दीखता है। वह प्राणशक्ति मैं ही हूँ !
‘तपश्चास्मि तपस्विषु’–द्वन्द्वसहिष्णुताको तप कहते हैं। परन्तु वास्तवमें परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिके लिये कितने ही कष्ट आयें, उनमें निर्विकार रहना ही असली तप है। यही तपस्वियोंमें तप है, इसीसे वे तपस्वी कहलाते हैं और इसी तपको भगवान् अपना स्वरूप बताते हैं। अगर तपस्वियोंमेंसे ऐसा तप निकाल दिया जाय तो वे तपस्वी नहीं रहेंगे।