अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम्।
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते॥
अनुबन्धम्, क्षयम्, हिंसाम्, अनवेक्ष्य, च, पौरुषम्,
मोहात्, आरभ्यते, कर्म, यत्, तत्, तामसम्, उच्यते॥ २५॥
यत् = जो, कर्म = कर्म, अनुबन्धम् = परिणाम, क्षयम् = हानि, हिंसाम् = हिंसा, च = और, पौरुषम् = सामर्थ्यको, अनवेक्ष्य = न विचारकर, मोहात् = केवल अज्ञानसे, आरभ्यते = आरम्भ किया जाता है, तत् = वह कर्म, तामसम् = तामस, उच्यते = कहा जाता है।
‘वह कर्म तामसिक कहा जाता है जो मोहवश, बिना परिणामों पर विचार किये हुए, (शक्ति और संपत्ति) की हानि पर विचार किये बिना, (दूसरों को) चोट पहुँचाने के लिये, तथा (अपनी) क्षमता से परे प्रारंभ किया जाता है’।
।।18.25।। व्याख्या — अनुबन्धम् — जिसको फलकी कामना होती है? वह मनुष्य तो फलप्राप्तिके लिये विचारपूर्वक कर्म करता है? परन्तु तामस मनुष्यमें मूढ़ताकी प्रधानता होनेसे वह कर्म करनेमें विचार करता ही नहीं। इस कार्यको करनेसे मेरा तथा दूसरे प्राणियोंका अभी और परिणाममें कितना नुकसान होगा? कितना अहित होगा — इस अनुबन्ध अर्थात् परिणामको न देखकर वह कार्य आरम्भ कर देता है।क्षयम् — इस कार्यको करनेसे अपने और दूसरोंके शरीरोंकी कितनी हानि होगी धन और समयका कितना खर्चा होगा इससे दुनियामें मेरा कितना अपमान? निन्दा? तिरस्कार आदि होगा? मेरा लोकपरलोक बिगड़ जायगा आदि नुकसानको न देखकर ही वह कार्य आरम्भ कर देता है।हिंसाम् — इस कर्मसे कितने जीवोंकी हत्या होगी कितने श्रेष्ठ व्यक्तियोंके सिद्धान्तों और मान्यताओंकी हत्या हो जायगी दूसरे मनुष्योंकी मनुष्यताकी कितनी भारी हिंसा हो जायगी अभीके और भावी जीवोंके शुद्ध भाव? आचरण? वेशभूषा? खानपान आदिकी कितनी भारी हिंसा हो जायगी इससे मेरा और दुनियाका कितना अधःपतन होगा आदि हिंसाको न देखकर ही वह कार्य आरम्भ कर देता है।अनवेक्ष्य च पौरुषम् — इस कामको करनेकी मेरेमें कितनी योग्यता है? कितना बल? सामर्थ्य है मेरे पास कितना समय है? कितनी बुद्धि है? कितनी कला है? कितना ज्ञान है आदि अपने पौरुष(पुरुषार्थ) को न,देखकर ही वह कार्य आरम्भ कर देता है।मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते — तामस मनुष्य कर्म करते समय उसके परिणाम? उससे होनेवाले नुकसान? हिंसा और अपनी सामर्थ्यका कुछ भी विचार न करके? जब जैसा मनमें भाव आया? उसी समय बिना विवेकविचारके वैसा ही कर बैठता है। इस प्रकार किया गया कर्म तामस कहलाता है।
सम्बन्ध — अब भगवान् सात्त्विक कर्ताके लक्षण बताते हैं।
श्रीरामकृष्णदेव की वाणी में मिलता है कि सत्त्वादि गुण-भेद से साधना तीन प्रकार की है। उन्होंने कहा है – “मैंने सब प्रकार की साधनायें की हैं। साधना तीन प्रकार की है – सात्त्विक, राजसिक, तामसिक। सात्त्विक साधना में मनुष्य ईश्वर को व्याकुल होकर पुकारता है और केवल उन्हीं का नाम लेकर पड़ा रहता है और कोई फलाकांक्षा नहीं है। राजसिक साधन में अनेक प्रकार की प्रक्रियायें और इतनी बार पुरश्चरण करने होगे, इतने तीर्थों में यात्रा करनी होगी, पंचतपा करना होगा, षोडश उपचारों से पूजा करनी होगी इत्यादि। तामसिक साधन में तमोगुण का आश्रय लेकर कर्म करना होता है जैसे – ‘जय काली माई की, क्या तू दर्शन नहीं देगी? यदि दर्शन नहीं देती, तो मैं अपने गले में छूरा भोंक दूँगा।’ परंतु सात्त्विक साधना निष्काम भाव से करने पर ईश्वर-दर्शन या ब्रह्मज्ञानलाभ होता है।