यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन् कार्ये सक्तमहैतुकम्।
अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम्॥
यत्, तु, कृत्स्नवत्, एकस्मिन्, कार्ये, सक्तम्, अहैतुकम्,
अतत्त्वार्थवत्, अल्पम्, च, तत्, तामसम्, उदाहृतम्॥ २२॥
तु = परंतु, यत् = जो ज्ञान, एकस्मिन् = एक, कार्ये = कार्यरूप शरीरमें(ही), कृत्स्नवत् = सम्पूर्णके सदृश, सक्तम् = आसक्त है*, च = तथा (जो), अहैतुकम् = बिना युक्तिवाला, अतत्त्वार्थवत् = तात्त्विक अर्थसे रहित (और), अल्पम् = तुच्छ है, तत् = वह, तामसम् = तामस, उदाहृतम् = कहा गया है।
‘जब कि वह ज्ञान जो एक ही प्रभाव में सीमित है मानो वही सब कुछ है, जो बिना तर्क-युक्ति का, सत्य में प्रतिष्ठित हुए बिना, और तुच्छ है – वह तामसिक बताया गया है’।
।।18.22।। व्याख्या — यत्तु (टिप्पणी प0 904.2) कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तम् — तामस मनुष्य एक ही शरीरमें सम्पूर्णकी तरह आसक्त रहता है अर्थात् उत्पन्न और नष्ट होनेवाले इस पाञ्चभौतिक शरीरको ही अपना स्वरूप मानता है। वह मानता है कि मैं ही छोटा बच्चा था? मैं ही जवान हूँ और मैं ही बूढ़ा हो जाऊँगा मैं भोगी? बलवान् और सुखी हूँ मैं धनी और बड़े कुटुम्बवाला हूँ मेरे समान दूसरा कौन है इत्यादि। ऐसी मान्यता मूढ़ताके कारण ही होती है — इत्यज्ञानविमोहिताः (16। 15)।अहैतुकम् — तामस मनुष्यकी मान्यता युक्ति और शास्त्रप्रमाणसे विरुद्ध होती है। यह शरीर हरदम बदल रहा है? शरीरादि वस्तुमात्र अभावमें परिवर्तित हो रही है? दृश्यमात्र अदृश्य हो रहा है और इनमें तू सदा ज्योंकात्यों रहता है अतः यह शरीर और तू एक कैसे हो सकते हैं — इस प्रकारकी युक्तियोंको वह स्वीकार नहीं करता।अतत्त्वार्थवदल्पं च — यह शरीर और मैं दोनों अलगअलग हैं — इस वास्तविक ज्ञान(विवेक) से वह रहित है। उसकी समझ अत्यन्त तुच्छ है अर्थात् तुच्छताकी प्राप्ति करानेवाली है। इसलिये इसको ज्ञान कहनेमें भगवान्को संकोच हुआ है। कारण कि तामस पुरुषमें मूढ़ताकी प्रधानता होती है। मूढ़ता और ज्ञानका आपसमें विरोध है. अतः भगवान्ने ज्ञान पद न देकर यत् और तत् पदसे ही काम चलाया है।तत्तामसमुदाहृतम् — युक्तिरहित? अल्प और अत्यन्त तुच्छ समझको ही महत्त्व देना तामस कहा गया है।जब तामस समझ ज्ञान है ही नहीं और भगवान्को भी इसको ज्ञान कहनेमें संकोच हुआ है? तो फिर इसका वर्णन ही क्यों किया गया कारण कि भगवान्ने उन्नीसवें श्लोकमें ज्ञानके त्रिविध भेद कहनेका उपक्रम किया है? इसलिये सात्त्विक और राजसज्ञानका वर्णन करनेके बाद तामस समझको भी कहनेकी आवश्यकता थी।
सम्बन्ध — अब भगवान् सात्त्विक कर्मका वर्णन करते हैं।