पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्।
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्॥
पृथक्त्वेन, तु, यत्, ज्ञानम्, नानाभावान्, पृथग्विधान्,
वेत्ति, सर्वेषु, भूतेषु, तत्, ज्ञानम्, विद्धि, राजसम्॥ २१॥
तु = किंतु, यत् = जो, ज्ञानम् = ज्ञान अर्थात् जिस ज्ञानके द्वारा मनुष्य, सर्वेषु = सम्पूर्ण, भूतेषु = भूतोंमें, पृथग्विधान् = भिन्न-भिन्न प्रकारके, नानाभावान् = नाना भावोंको, पृथक्त्वेन = अलग-अलग, वेत्ति = जानता है, तत् = उस, ज्ञानम् = ज्ञानको (तू), राजसम् = राजस, विद्धि = जान।
‘लेकिन वह ज्ञान जो सभी जीवों में अलग-अलग प्रकार की एक दूसरे से पृथक सत्ताएँ देखता है, उस ज्ञान को राजसिक जानो’।
।।18.21।। व्याख्या — पृथक्त्वेन तु (टिप्पणी प0 904.1) यज्ज्ञानं नानाभावान् पृथग्विधान् — राजस ज्ञानमें राग की मुख्यता होती है — रजो रागात्मकं विद्धि (गीता 14। 7)। रागका यह नियम है कि वह जिसमें आ जाता है? उसमें किसीके प्रति आसक्ति? प्रियता पैदा करा देता है और किसीके प्रति द्वेष पैदा करा देता है। इस रागके कारण ही मनुष्य? देवता? यक्षराक्षस? पशुपक्षी? कीटपतङ्ग? वृक्षलता आदि जितने भी चरअचर प्राणी हैं? उन प्राणियोंकी विभिन्न आकृति? स्वभाव? नाम? रूप? गुण आदिको लेकर राजस ज्ञानवाला मनुष्य उनमें रहनेवाली एक ही अविनाशी आत्माको तत्त्वसे अलगअलग समझता है।वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् — इसी तरह जिस ज्ञानसे मनुष्य अलगअलग शरीरोंमें अन्तःकरण? स्वभाव? इन्द्रियाँ? प्राण आदिके सम्बन्धसे प्राणियोंको भी अलगअलग मानता है? वह ज्ञान राजस कहलाता है। राजस ज्ञानमें जडचेतनका विवेक नहीं होता।
सम्बन्ध — अब तामस ज्ञानका वर्णन करते हैं।