आत्मसम्भाविता: स्तब्धा धनमानमदान्विता:।
यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्॥
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिता:।
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयका:॥
आत्मसम्भाविता:, स्तब्धा:, धनमानमदान्विता:,
यजन्ते, नामयज्ञै:, ते, दम्भेन, अविधिपूर्वकम्॥ १७॥
अहङ्कारम्, बलम्, दर्पम्, कामम्, क्रोधम्, च, संश्रिता:,
माम्, आत्मपरदेहेषु, प्रद्विषन्त:, अभ्यसूयका:॥ १८॥
ते = वे, आत्मसम्भाविता: = अपने-आपको ही श्रेष्ठ माननेवाले, स्तब्धा: = घमण्डी पुरुष, धनमानमदान्विता: = धन और मानके मदसे युक्त होकर, नामयज्ञै: = केवल नाममात्रके यज्ञोंद्वारा, दम्भेन = पाखण्डसे, अविधिपूर्वकम् = शास्त्रविधिरहित, यजन्ते = यजन करते हैं।
अहङ्कारम् = अहंकार, बलम् = बल, दर्पम् = घमण्ड, कामम् = कामना (और), क्रोधम् = क्रोधादिके, संश्रिता: = परायण, च = और, अभ्यसूयका: = दूसरोंकी निन्दा करनेवाले पुरुष, आत्मपरदेहेषु = अपने और दूसरोंके शरीरमें (स्थित), माम् = मुझ अन्तर्यामीसे, प्रद्विषन्त: = द्वेष करनेवाले होते हैं।
‘आत्माभिमान से युक्त होकर, घमण्ड व धन के मद में चूर, वे शास्त्रविधि विहीन रीति से केवल दिखावे के लिये नाममात्र का यज्ञ करते हैं’। ‘अहंकार, बल, धृष्टता , वासना और क्रोध के वशीभूत होकर ये द्रोही व्यक्ति अपने व दूसरों के शरीर में मुझ (अन्तरात्मा) को घृणा करते हैं’।
।।16.17।। व्याख्या — आत्मसम्भाविताः — वे धन? मान? बड़ाई? आदर आदिकी दृष्टिसे अपने मनसे ही अपनेआपको बड़ा मानते हैं? पूज्य समझते हैं कि हमारे समान कोई नहीं है अतः हमारा पूजन होना चाहिये? हमारा आदर होना चाहिये? हमारी प्रशंसा होनी चाहिये। वर्ण? आश्रम? विद्या? बुद्धि? पद? अधिकार? योग्यता आदिमें हम सब तरहसे श्रेष्ठ हैं अतः सब लोगोंको हमारे अनुकूल चलना चाहिये।स्तब्धाः — वे किसीके सामने नम्र नहीं होते? नमते नहीं। कोई सन्तमहात्मा या अवतारी भगवान् ही सामने क्यों न आ जायँ? तो भी वे उनको नमस्कार नहीं करेंगे। वे तो अपनेआपको ही ऊँचा समझते हैं? फिर किसके सामने नम्रता करें और किसको नमस्कार करें कहीं किसी कारणसे परवश होकर लोगोंके सामने झुकना भी पड़े? तो अभिमानसहित ही झुकेंगे। इस प्रकार उनमें बहुत ज्यादा ऐंठअकड़ रहती है।धनमानमदान्विताः — वे धन और मानके मदसे सदा चूर रहते हैं। उनमें धनका? अपने जनोंका? जमीनजायदाद और मकान आदिका मद (नशा) होता है। इधरउधर पहचान हो जाती है? तो उसका भी उनके मनमें मद होता है कि हमारी तो बड़ेबड़े मिनिस्टरोंतक पहचान है। हमारे पास ऐसी शक्ति है? जिससे चाहे जो प्राप्त कर सकते हैं और चाहे जिसका नाश कर सकते हैं। इस प्रकार धन और मान ही उनका सहारा होता है। इनका ही उन्हें नशा होता है? गरमी होती है। अतः वे इनको ही श्रेष्ठ मानते हैं।यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेन — वे लोग (पन्द्रहवें श्लोकमें आये यक्ष्ये दास्यामि पदोंके अनुसार) दम्भपूर्वक नाममात्रके यज्ञ करते हैं। वे केवल लोगोंको दिखानेके लिये और अपनी महिमाके लिये ही यज्ञ करते हैं? तथा इस भावसे करते हैं कि दूसरोंपर असर पड़ जाय और वे हमारे प्रभावसे प्रभावित हो जायँ उनकी आँख खुल जाय कि हम क्या हैं? उन्हें चेत हो जाय आदि।लोगोंमें हमारा नाम हो जाय? प्रसिद्धि हो जाय? आदर हो जाय — इसके लिये वे यज्ञके नामपर अपने नामका खूब प्रचार करेंगे? अपने नामका छापा (पैम्फलेट) छपवायेंगे। ब्राह्मणोंके लिये भोजन करेंगे? तो खीरमें कपूर डाल देंगे? जिससे वे अधिक न खा सकें क्योंकि उससे खर्चा भी अधिक नहीं होगा और नाम भी हो जायगा। ऐसे ही पंक्तिमें भोजनके लिये दोदो? चारचार? पाँचपाँच सकोरे और पत्तलें एक साथ परोस देंगे? जिससे उन सकोरे और पत्तलेंको बाहर फेंकनेपर उनका ढेर लग जाय और लोगोंको यह पता चल जाय कि ये कितने अच्छे व्यक्ति हैं? जिन्होंने इतने ब्राह्मणोंको भोजन कराया है। इस प्रकार ये आसुरीसम्पदावालोंके भीतर भाव होते हैं और भावोंके अनुसार ही उनके आचरण होते हैं।आसुरीसम्पत्तिवाले व्यक्ति शास्त्रोक्त यज्ञ? दान? पूजन आदि कर्म तो करते हैं और उनके लिये पैसे भी खर्च करते हैं? पर करते हैं शास्त्रविधिकी परवाह न करके और दम्भपूर्वक ही।मन्दिरोंमें जब कोई मेलामहोत्सव हो और ज्यादा लोगोंके आनेकी उम्मीद हो तथा बड़ेबड़े धनी लोग आनेवाले हों? तब मन्दिरको अच्छी तरह सजायेंगे? ठाकुरजीको खूब बढ़ियाबढ़िया गहनेकपड़े पहनायेंगे? जिससे ज्यादा लोग आ जायँ और खूब भेंटचढ़ावा इकट्ठा हो जाय। इस प्रकार ठाकुरजीका तो नाममात्रका पूजन होता है? पर वास्तवमें पूजन होता है लोगोंका। ऐसे ही कोई मिनिस्टर या अफसर आनेवाला हो? तो उनको राजी करनेके लिये ठाकुरजीको खूब सजायेंगे और जब वे मन्दिरमें आयेंगे? तब उनका खूब आदरसत्कार करेंगे? उनको ठाकुरजीकी माला देंगे? प्रसाद (जो उनके लिये विशेषरूपसे तैयार रखा रहता है) देंगे? इसलिये कि वे राजी हो जायँगे? तो हमारे व्यापारमें? घरेलू कामोंमें हमारी सहायता करेंगे? मुकदमे आदिमें हमारा पक्ष लेंगे? आदि। इन भावोंसे वे ठाकुरजीका जो पूजन करते हैं? वह तो नाममात्रका पूजन है। वास्तवमें पूजन होता है — अपने व्यापारका? घरेलू कामोंका? लड़ाईझगड़ोंका क्योंकि उनका उद्देश्य ही वही है।गौसेवीसंस्थासंचालक भी गोशालाओंमें प्रायः दूध देनेवाली स्वस्थ गायोंको ही रखेंगे और उनको अधिक चारा देंगे पर लूलीलँगड़ी? अपाहिज? अन्धी और दूध न देनेवाली गायोंको नहीं रखेंगे? तथा किसीको रखेंगे भी तो उसको दूध देनेवाली गायोंकी अपेक्षा बहुत कम चारा देंगे। परन्तु हमारी गोशालामें कितना गोपालन हो रहा है? इसकी असलियतकी तरफ खयाल न करके केवल लोगोंको दिखानेके लिये उसका झूठा प्रचार करेंगे। छापा? लेख? विज्ञापन? पुस्तिका आदि छपवाकर बाँटेंगे? जिससे पैसा तो अधिकसेअधिक आये? पर खर्चा कमसेकम हो।धार्मिक संस्थाओँमें भी जो संचालक कहलाते हैं? वे प्रायः उन धार्मिक संस्थाओंके पैसोंसे अपने घरका काम चलायेंगे। अपनेको नफा किस प्रकार हो? हमारी दूकान किस तरह चले? पैसे कैसे मिलें — इस प्रकार अपने स्वार्थको लेकर केवल दिखावटीपनसे सारा काम करेंगे।प्रायः साधनभजन करनेवाले भी दूसरेको आता देखकर आसन लगाकर बैठ जायँगे? भजनध्यान करने लग जायँगे? माला घुमाने लग जायँगे। परन्तु कोई देखनेवाला न हो तो बातचीतमें लग जायँगे? ताशचौपड़ खेलेंगे अथवा सो जायँगे। ऐसा जो साधनभजन होता है? वह केवल इसलिये कि दूसरे मुझे अच्छा मानें? भक्त मानें और मेरी प्रशंसा करें? मेरा आदरसम्मान करें? मुझे पैसे मिलें? लोगोंमें मेरा नाम हो जाय? आदि। इस प्रकार यह साधनभजन भगवान्का तो नाममात्रके लिये होता है? पर वास्तवमें साधनभजन होता है अपने नामका? अपने शरीरका? पैसोंका। इस प्रकार आसुरी प्रकृतिवालोंके विषयमें कहाँतक कहा जाय
अविधिपूर्वकम् — वे आसुर मनुष्य शास्त्रविधिको तो मानते ही नहीं? सदा शास्त्रनिषिद्ध काम करते हैं। वे यज्ञ? दान आदि तो करेंगे? पर उनको विधिपूर्वक नहीं करेंगे। दान करेंगे तो सुपात्रको न देकर कुपात्रको देंगे। कुपात्रोंके साथ ही एकता रखेंगे। इस प्रकार उलटेउलटे काम करेंगे। बुद्धि सर्वथा विपरीत होनेके कारण उनको उलटी बात भी सुलटी ही दीखती है — सर्वार्थान् विपरीतांश्च (गीता 18। 32)।
।।16.18।। व्याख्या — अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः — वे आसुर मनुष्य जो कुछ काम करेंगे? उसको अहङ्कार? हठ? घमण्ड? काम और क्रोधसे करेंगे। जैसे भक्त भगवान्के आश्रित रहता है? ऐसे ही वे आसुर लोग अहंकार? हठ? काम? आदिके आश्रित रहते हैं। उनके मनमें यह बात अच्छी तरहसे जँची हुई रहती है कि अहङ्कार? हठ? घमण्ड? कामना और क्रोधके बिना काम नहीं चलेगा संसारमें ऐसा होनेसे ही काम चलता है? नहीं तो मनुष्योंको दुःख ही पाना पड़ता है जो इनका (अहङ्कार? हठ आदिका) आश्रय नहीं लेते? वे बुरी तरहसे कुचले जाते हैं सीधेसादे व्यक्तिको संसारमें कौन मानेगा इसलिये अहंकारादिके रहनेसे ही अपना मान होगा? सत्कार होगा और लोगोंमें नाम होगा? जिससे लोगोंपर हमारा दबाव? आधिपत्य रहेगा।मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तः — भगवान् कहते हैं कि मैं जो उनके शरीरमें और दूसरोंके शरीरमें रहता हूँ? उस मेरे साथ वे आसुर मनुष्य वैर रखते हैं। भगवान्के साथ वैर रखना क्या है — श्रुतिस्मृति ममैवाज्ञे य उल्लङ्घ्य प्रवर्तते।
आज्ञाभङ्गी मम द्वेषी नरके पतति ध्रुवम्।।श्रुति और स्मृति — ये दोनों मेरी आज्ञाएँ हैं। इनका उल्लङ्घन करके जो मनमाने ढंगसे बर्ताव करता है? वह मेरी आज्ञाभङ्ग करके मेरे साथ द्वेष रखनेवाला मनुष्य निश्चित ही नरकोंमें गिरता है। वे अपने अन्तःकरणमें विराजमान परमात्माके साथ भी विरोध करते हैं अर्थात् हृदयमें जो अच्छी स्फुरणाएँ होती हैं? सिद्धान्तकी अच्छी बातें आती हैं? उनकी वे उपेक्षातिरस्कार करते हैं? उनको मानते नहीं। वे दूसरे लोगोंकी अवज्ञा करते हैं? उनका तिरस्कार करते हैं? अपमान करते हैं? उनको दुःख देते हैं? उनसे अच्छी तरहसे द्वेष रखते हैं। यह सब उन प्राणियोंके रूपमें भगवान्के साथ द्वेष करना है।अभ्यसूयकाः — वे मेरे और दूसरोंके गुणोंमें दोषदृष्टि रखते हैं। मेरे विषयमें वे कहते हैं कि भगवान् बड़े पक्षपाती हैं वे भक्तोंकी तो रक्षा करते हैं और दूसरोंका विनाश करते हैं? यह बात बढ़िया नहीं है। आजतक जितने संतमहात्मा हुए हैं और अभी भी जो संतमहात्मा तथा अच्छी स्थितिवाले साधक हैं? उनके विषयमें वे आसुर लोग कहते हैं कि उनमें भी रागद्वेष? कामक्रोध? स्वार्थ? दिखावटीपन आदि दोष पाये जाते हैं किसी भी संतमहात्माका चरित्र ऐसा नहीं है? जिसमें ये दोष न आये हों अतः यह सब पाखण्ड है हमने भी इन सब बातोंको करके देखा है हमने भी संयम किया है? भजन किया है? व्रत किये हैं? तीर्थ किये हैं? पर वास्तवमें इनमें कोई दम नहीं है हमें तो कुछ नहीं मिला? मुफ्तमें ही दुःख पाया उनके करनेमें वह समय हमारा व्यर्थमें ही बरबाद हुआ है वे लोग भी किसीके बहकावेमें आकर अपना समय बरबाद कर रहे हैं अभी ये ऐसे प्रवाहमें बहे हुए हैं और उलटे रास्तेपर जा रहे हैं अभी इनको होश नहीं है? पर जब कभी चेतेंगे? तब उनको भी पता लगेगा आदिआदि।