चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिता:।
कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिता:॥
आशापाशशतैर्बद्धा: कामक्रोधपरायणा:।
ईहन्ते कामभोगार्थ-मन्यायेनार्थसञ्चयान्॥
चिन्ताम्, अपरिमेयाम्, च, प्रलयान्ताम्, उपाश्रिता:,
कामोपभोगपरमा:, एतावत्, इति, निश्चिता:॥ ११॥
आशापाशशतै:, बद्धा:, कामक्रोधपरायणा:,
ईहन्ते, कामभोगार्थम्, अन्यायेन, अर्थसञ्चयान्॥ १२॥
प्रलयान्ताम् = मृत्युपर्यन्त रहनेवाली, अपरिमेयाम् = असंख्य, चिन्ताम् = चिन्ताओंका, उपाश्रिता: = आश्रय लेनेवाले, कामोपभोगपरमा: = विषयभोगोंके भोगनेमें तत्पर रहनेवाले, च = और, एतावत् = ‘इतना ही सुख है’ इति = इस प्रकार, निश्चिता: = माननेवाले होते हैं।
आशापाशशतै: = आशाकी सैकड़ों फाँसियोंसे, बद्धा: = बँधे हुए मनुष्य, कामक्रोधपरायणा: = काम-क्रोधके परायण होकर, कामभोगार्थम् = विषय-भोगोंके लिये, अन्यायेन = अन्यायपूर्वक, अर्थसञ्चयान् = धनादि पदार्थोंको संग्रह करनेकी, ईहन्ते = चेष्टा करते रहते हैं।
।।16.11।। व्याख्या — चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः — आसुरीसम्पदावाले मनुष्योंमें ऐसी चिन्ताएँ रहती हैं? जिनका कोई मापतौल नहीं है। जबतक प्रलय अर्थात् मौत नहीं आती? तबतक उनकी चिन्ताएँ मिटती नहीं। ऐसी प्रलयतक रहनेवाली चिन्ताओंका फल भी प्रलयहीप्रलय अर्थात् बारबार मरना ही होता है।चिन्ताके दो विषय होते हैं — एक पारमार्थिक और दूसरा सांसारिक। मेरा कल्याण? मेरा उद्धार कैसे हो परब्रह्म परमात्माका निश्चय कैसे हो (चिन्ता परब्रह्मविनिश्चयाय) इस प्रकार जिनको पारमार्थिक चिन्ता होती है? वे श्रेष्ठ हैं। परन्तु आसुरीसम्पदावालोंको ऐसी चिन्ता नहीं होती। वे तो इससे विपरीत सांसारिक चिन्ताओंके आश्रित रहते हैं कि हम कैसे जीयेंगे अपना जीवननिर्वाह कैसे करेंगे हमारे बिना बड़ेबूढ़े किसके आश्रित जीयेंगे हमारा मान? आदर? प्रतिष्ठा? इज्जत? प्रसिद्धि? नाम आदि कैसे बने रहेंगे मरनेके बाद हमारे बालबच्चोंकी क्या दशा होगी मर जायँगे तो धनसम्पत्ति? जमीनजायदादका क्या होगा धनके बिना हमारा काम कैसे चलेगा धनके बिना मकानकी मरम्मत कैसे होगी आदिआदि।मनुष्य व्यर्थमें ही चिन्ता करता है। निर्वाह तो होता रहेगा। निर्वाहकी चीजें तो बाकी रहेंगी और उनके रहते हुए ही मरेंगे। अपने पास एक लंगोटी रखनेवाले विरक्तसेविरक्तकी भी फटी लंगोटी और फूटी तूम्बी बाकी बचती है और मरता है पहले। ऐसे ही सभी व्यक्ति वस्तु आदिके रहते हुए ही मरते हैं। यह नियम नहीं है कि,धन पासमें होनेसे आदमी मरता न हो। धन पासमें रहतेरहते ही मनुष्य मर जाता है और धन पड़ा रहता है? काममें नहीं आता।एक बहुत बड़ा धनी आदमी था। उसने तिजोरीकी तरह लोहेका एक मजबूत मकान बना रखा था? जिसमें बहुत रत्न रखे हुए थे। उस मकानका दरवाजा ऐसा बना हुआ था? जो बंद होनेपर चाबीके बिना खुलता नहीं था। एक बार वह धनी आदमी बाहर चाबी छोड़कर उस मकानके भीतर चला गया और उसने भूलसे दरवाजा बंद कर लिया। अब चाबीके बिना दरवाना न खुलनेसे अन्न? जल? हवाके अभावमें मरते हुए उसने लिखा कि इतनी धनसम्पत्ति आज मेरे पास रहते हुए भी मैं मर रहा हूँ क्योंकि मुझे भीतर अन्नजल नहीं मिल रहा है? हवा नहीं मिल रही है ऐसे ही खाद्य पदार्थोंके रहनेसे नहीं मरेगा? यह भी नियम नहीं है। भोगोंके पासमें होते हुए भी ऐसे ही मरेगा। जैसे पेट आदिमें रोग लग जानेपर वैद्यडाक्टर उसको (अन्न पासमें रहते हुए भी) अन्न खाने नहीं देते? ऐसे ही मरना हो? तो पदार्थोंके रहते हुए भी मनुष्य मर जाता है।
जो अपने पास एक कौड़ीका भी संग्रह नहीं करते? ऐसे विरक्त संतोंको भी प्रारब्धके अनुसार आवश्यकतासे अधिक चीजें मिल जाती हैं। अतः जीवननिर्वाह चीजोंके अधीन नहीं है (टिप्पणी प0 818)। परन्तु इस तत्त्वको आसुरी प्रकृतिवाले मनुष्य नहीं समझ सकते। वे तो यही समझते हैं कि हम चिन्ता करते हैं? कामना करते हैं? विचार करते हैं? उद्योग करते हैं? तभी चीजें मिलती हैं। यदि ऐसा न करें? तो भूखों मरना पड़े कामोपभोगपरमाः — जो मनुष्य धनादि पदार्थोंका उपभोग करनेके परायण हैं? उनकी तो हरदम यही इच्छा रहती है कि सुखसामग्रीका खूब संग्रह कर लें और भोग भोग लें। उनको तो भोगोंके लिये धन चाहिये संसारमें बड़ा बननेके लिये धन चाहिये? सुखआराम? स्वादशौकीनी आदिके लिये धन चाहिये। तात्पर्य है कि उनके लिये भोगोंसे बढ़कर कुछ नहीं है।
एतावदिति निश्चिताः — उनका यह निश्चय होता है कि सुख भोगना और संग्रह करना — इसके सिवाय और कुछ नहीं है (टिप्पणी प0 819.1)। इस संसारमें जो कुछ है? यही है। अतः उनकी दृष्टिमें परलोक एक ढकोसला है। उनकी मान्यता रहती है कि मरनेके बाद कहीं आनाजाना नहीं होता। बस? यहाँ शरीरके रहते हुए जितना सुख भोग लें? वही ठीक है क्योंकि मरनेपर तो शरीर यहीं बिखर जायगा (टिप्पणी प0 819.2)। शरीर स्थिर रहनेवाला है नहीं? आदिआदि भोगोंके निश्चयके सामने वे पापपुण्य? पुनर्जन्म आदिको भी नहीं मानते।
।।16.12।। व्याख्या — आशापाशशतैर्बद्धाः — आसुरी सम्पत्तिवाले मनुष्य आशारूपी सैकड़ों पाशोंसे बँधे रहते हैं अर्थात् उनको इतना धन हो जायगा? इतना मान हो जायगा? शरीरमें नीरोगता आ जायगी आदि सैकड़ों आशाओंकी फाँसियाँ लगी रहती हैं। आशाकी फाँसीसे बँधे हुए मनुष्योंके पास लाखोंकरोड़ों रुपये हो जायँ? तो भी उनका मँगतापन नहीं मिटता उनकी तो यही आशा रहती है कि सन्तोंसे कुछ मिल जाय? भगवान्से कुछ मिल जाय? मनुष्योंसे कुछ मिल जाय। इतना ही नहीं पशुपक्षी? वृक्षलता? पहाड़समुद्र आदिसे भी हमें कुछ मिल जाय। इस प्रकार उनमें सदा खाऊँखाऊँ बनी रहती है। ऐसे व्यक्तियोंकी सांसारिक आशाएँ कभी पूरी नहीं होतीं (गीता 9। 12)। यदि पूरी हो भी जायँ? तो भी कुछ फायदा नहीं है क्योंकि यदि वे जीते रहेंगे? तो आशावाली वस्तु नष्ट हो जायगी और आशावाली वस्तु रहेगी? तो वे मर जायँगे अथवा दोनों ही नष्ट हो जायँगे।जो आशारूपी फाँसीसे बँधे हुए हैं? वे कभी एक जगह स्थिर नहीं रह सकते और जो इस आशारूपी फाँसीसे छूट गये हैं? वे मौजसे एक जगह रहते हैं — आशा नाम मनुष्याणां काचिदाश्चर्यश्रृङ्खला।
यया बद्धाः प्रधावन्ति मुक्तास्तिष्ठन्ति पङ्गुवत्।।
कामक्रोधपरायणाः — उनका परम अयन? स्थान काम और क्रोध ही होते हैं (टिप्पणी प0 819.3) अर्थात् अपनी कामनापूर्तिके करनेके लिये और क्रोधपूर्वक दूसरोंको कष्ट देनेके लिये ही उनका जीवन होता है। कामक्रोधके परायण मनुष्योंका यह निश्चय रहता है कि कामनाके बिना मनुष्य जड हो जाता है। क्रोधके बिना उसका तेज भी नहीं रहता। कामनासे ही सब काम होता है? नहीं तो आदमी काम करे ही क्यों कामनाके बिना तो आदमीका जीवन ही भार हो जायगा। संसारमें काम और क्रोध ही तो सार चीज है। इसके बिना लोग हमें संसारमें रहने ही नहीं देंगे। क्रोधसे ही शासन चलता है? नहीं तो शासनको मानेगा ही कौन क्रोधसे दबाकर दूसरोंको ठीक करना चाहिये? नहीं तो लोग हमारा सर्वस्व छीन लेंगे। फिर तो हमारा अपना कुछ अस्तित्व ही नहीं रहेगा? आदि।ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसंचयान् — आसुरी प्रकृतिवाले मनुष्योंका उद्देश्य धनका संग्रह करना और विषयोंका भोग करना होता है। इस उद्देश्यकी पूर्तिके लिये वे बेईमानी? धोखेबाजी? विश्वासघात? टैक्सकी चोरी आदि करके दूसरोंका हक मारकर मन्दिर? बालक? विधवा आदिका धन दबाकर और इस तरह अनेक अन्यान्य पाप करके धनका संचय करना चाहते हैं। कारण कि उनके मनमें यह बात गहराईसे बैठी रहती है कि आजकलके जमानेमें ईमानदारीसे? न्यायसे कोई धनी थोड़े ही हो सकता है ये जितने धनी हुए हैं? सब अन्याय? चोरी? धोखेबाजी करके ही हुए हैं। ईमानदारीसे? न्यायसे काम करनेकी जो बात है? वह तो कहनेमात्रकी है काममें नहीं आ सकती। यदि हम न्यायके अनुसार काम करेंगे? तो हमें दुःख पाना पड़ेगा और जीवनधारण करना मुश्किल हो जायगा। ऐसा उन आसुर स्वभाववाले व्यक्तियोंका निश्चय होता है।
जो व्यक्ति न्यायपूर्वक स्वर्गके भोगोंकी प्राप्तिके लिये लगे हुए हैं उनके लिये भी भगवान्ने कहा है कि उन लोगोंकी बुद्धिमें हमें परमात्माकी प्राप्ति करना है यह निश्चय हो ही नहीं सकता (गीता 2। 44)। फिर जो अन्यायपूर्वक धन कमाकर प्राणोंके पोषणमें लगे हुए हैं? उनकी बुद्धिमें परमात्मप्राप्तिका निश्चय कैसे हो सकता है परन्तु वे भी यदि चाहें तो परमात्मप्राप्तिका निश्चय करके साधनपरायण हो सकते हैं। ऐसा निश्चय करनेके लिये किसीको भी मना नहीं है क्योंकि मनुष्यजन्म परमात्मप्राप्तिके लिये ही मिला है।
सम्बन्ध — आसुर स्वभाववाले व्यक्ति लोभ? क्रोध और अभिमानको लेकर किस प्रकारके मनोरथ किया करते हैं? उसे क्रमशः आगेके तीन श्लोकोंमें बताते हैं।