इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासत:।
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते॥
इति, क्षेत्रम्, तथा, ज्ञानम्, ज्ञेयम्, च, उक्तम्, समासत:,
मद्भक्त:, एतत्, विज्ञाय, मद्भावाय, उपपद्यते॥19॥
इति = इस प्रकार, क्षेत्रम् = क्षेत्र१, तथा = तथा, ज्ञानम् = ज्ञान१, च= और, ज्ञेयम् = जानने योग्य परमात्माका स्वरूप३, समासत: = संक्षेपसे, उक्तम् = कहा गया, मद्भक्त: = मेरा भक्त, एतत् = इसको, विज्ञाय = तत्त्वसे जानकर, मद्भावाय = मेरे स्वरूपको, उपपद्यते = प्राप्त होता है।
‘इस प्रकार क्षेत्र , ज्ञान तथा ज्ञेय, वह जिसे जाना जाता है,यहाँ संक्षिप्त रूप से बताए गये हैं। इन्हें जान कर मेरा भक्त मेरी स्थिति के उपयुक्त हो जाता है’।
।।13.19।। व्याख्या — इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः — इसी अध्यायके पाँचवें और छठे श्लोकमें जिसका वर्णन किया गया है? वह क्षेत्र है सातवेंसे ग्यारहवें श्लोकतक जिस साधनसमुदायका,वर्णन किया गया है? वह ज्ञान है और बारहवेंसे सत्रहवें श्लोकतक जिसका वर्णन किया गया है? वह ज्ञेय है। इस तरह मैंने क्षेत्र? ज्ञान और ज्ञेयका संक्षेपसे वर्णन किया है।मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते — मेरा भक्त क्षेत्रको? साधनसमुदायरूप ज्ञानको और ज्ञेय तत्त्व(परमात्मा)को तत्त्वसे जानकर मेरे भावको प्राप्त हो जाता है।क्षेत्रको ठीक तरहसे जान लेनेपर क्षेत्रसे सम्बन्धविच्छेद हो जाता है। ज्ञानको अर्थात् साधनसमुदायको ठीक तरहसे जाननेसे? अपनानेसे देहाभिमान (व्यक्तित्व) मिट जाता है। ज्ञेय तत्त्वको ठीक तरहसे जान लेनेपर उसकी प्राप्ति हो जाती है अर्थात् परमात्मतत्त्वके साथ अभिन्नताका अनुभव हो जाता है। सम्बन्ध — इसी अध्यायके पहले और दूसरे श्लोकमें जिस क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका संक्षेपसे वर्णन किया था? उसीका विस्तारसे वर्णन करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ करते हैं।