सञ्जय उवाच
एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य
कृताञ्जलिर्वेपमान: किरीटी।
नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं
सगद्गदं भीतभीत: प्रणम्य॥
एतत्, श्रुत्वा, वचनम्, केशवस्य, कृताञ्जलि:, वेपमान:, किरीटी,
नमस्कृत्वा, भूय:, एव, आह, कृष्णम्, सगद्गदम्, भीतभीत:, प्रणम्य॥ ३५॥
केशवस्य = केशवभगवान् के, एतत् = इस, वचनम् = वचनको, श्रुत्वा = सुनकर, किरीटी = मुकुटधारी अर्जुन, कृताञ्जलि: = हाथ जोड़कर, वेपमान: = काँपता हुआ, नमस्कृत्वा = नमस्कार करके, भूय: = फिर, एव = भी, भीतभीत: = अत्यन्त भयभीत होकर, प्रणम्य = प्रणाम करके, कृष्णम् = भगवान् श्रीकृष्णके प्रति, सगद्गदम् = गद्गद वाणीसे, आह = बोला।
‘संजय ने कहा’ : ‘केशव (श्रीकृष्ण) के इस संभाषण को सुनकर गदाधारी (अर्जुन) हथेलियों को जोड़कर, काँपते हुए, दण्डायमान हो गया और फिर से गद्गद वाणी में, झुककर भयातुर हो कर बोला’।
।।11.35।। व्याख्या–‘एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी’– अर्जुन तो पहलेसे भयभीत थे ही, फिर भगवान्ने मैं काल हूँ, सबको खा जाऊँगा — ऐसा कहकर मानो डरे हुएको और डरा दिया। तात्पर्य है कि ‘कालोऽस्मि’–यहाँसे लेकर ‘मया हतांस्त्वं जहि’–यहाँतक भगवान्ने नाश-ही-नाशकी बात बतायी। इसे सुनकर अर्जुन डरके मारे काँपने लगे और हाथ जोड़कर बार-बार नमस्कार करने लगे।
अर्जुनने इन्द्रकी सहायताके लिये जब काल, खञ्ज आदि राक्षसोंको मारा था, तब इन्द्रने प्रसन्न होकर अर्जुनको सूर्यके समान प्रकाशवाला एक दिव्य ‘किरीट’ (मुकुट) दिया था। इसीसे अर्जुनका नाम किरीटी पड़ गया (टिप्पणी प0 598)। यहाँ ‘किरीटी’ कहनेका तात्पर्य है कि जिन्होंने बड़े-बड़े राक्षसोंको मारकर इन्द्रकी सहायता की थी,वे अर्जुन भी भगवान्के विराट्रूपको देखकर कम्पित हो रहे हैं।‘नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं गद्गद भीतभीतः प्रणम्य’– काल सबका भक्षण करता है किसीको भी छोड़ता नहीं। कारण कि यह भगवान्की संहारशक्ति है, जो हरदम संहार करती ही रहती है। इधर अर्जुनने जब भगवान्के अत्युग्र विराट्रूपको देखा तो उनको लगा कि भगवान् कालके भी काल– महाकाल हैं। उनके सिवाय दूसरा कोई भी कालसे बचानेवाला नहीं है। इसलिये अर्जुन भयभीत होकर भगवान्को बारबार प्रणाम करते हैं।‘भूयः’ कहनेका तात्पर्य है; कि पहले पंद्रहवेंसे इकतीसवें श्लोकतक अर्जुनने भगवान्की स्तुति और नमस्कार किया, अब फिर भगवान्की स्तुति और नमस्कार करते हैं।हर्षसे भी वाणी गद्गद होती है और भयसे भी। यहाँ भयका विषय है। अगर अर्जुन बहुत ज्यादा भयभीत होते तो वे बोल ही न सकते। परन्तु अर्जुन गद्गद वाणीसे बोलते हैं। इससे सिद्ध होता है कि वे इतने भयभीत नहीं हैं।
सम्बन्ध–अब आगेके श्लोकसे अर्जुन भगवान्की स्तुति करना आरम्भ करते हैं।