दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम्।
मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्॥
दण्ड:, दमयताम्, अस्मि, नीति:, अस्मि, जिगीषताम्,
मौनम्, च, एव, अस्मि, गुह्यानाम्, ज्ञानम्, ज्ञानवताम्, अहम्॥ ३८॥
दमयताम् = दमन करनेवालोंका, दण्ड: = दण्ड अर्थात् दमन करनेकी शक्ति, अस्मि = हूँ, जिगीषताम् = जीतनेकी इच्छावालोंकी, नीति: = नीति, अस्मि = हूँ, गुह्यानाम् = गुप्त रखनेयोग्य भावोंका (रक्षक), मौनम् = मौन, अस्मि = हूँ, च = और, ज्ञानवताम् = ज्ञानवानोंका, ज्ञानम् = तत्त्वज्ञान, अहम् = मैं, एव = ही, अस्मि = हूँ।
‘दण्ड देने वालों में मैं राज-दण्ड हूँ; विजय चाहने वालों में मैं राजनेतृत्व हूँ; गोपनीय वस्तुओं में मौन हूँ; और ज्ञानियों का मैं ज्ञान हूँ’।
।।10.38।। व्याख्या–‘दण्डो दमयतामस्मि’–दुष्टोंको दुष्टतासे बचाकर सन्मार्गपर लानेके लिये दण्डनीति मुख्य है। इसलिये भगवान्ने इसको अपनी विभूति बताया है।
‘नीतिरस्मि जिगीषताम्’–नीतिका आश्रय लेनेसे ही मनुष्य विजय प्राप्त करता है और नीतिसे ही विजय ठहरती है। इसलिये नीतिको भगवान्ने अपनी विभूति बताया है।
‘मौनं चैवास्मि गुह्यानाम्’ — गुप्त रखनेयोग्य जितने भाव हैं, उन सबमें मौन (वाणीका संयम अर्थात् चुप रहना) मुख्य है; क्योंकि चुप रहनेवालेके भावोंको हरेक व्यक्ति नहीं जान सकता। इसलिये गोपनीय भावोंमें भगवान्ने मौनको अपनी विभूति बताया है।
‘ज्ञानं ज्ञानवतामहम्’ — संसारमें कला-कौशल आदिको जाननेवालोंमें जो ज्ञान (जानकारी) है, वह भगवान्की विभूति है। तात्पर्य है कि ऐसा ज्ञान अपनेमें और दूसरोंमें देखनेमें आये, तो इसे भगवान्की ही विभूति माने।इन सब विभूतियोंमें जो विलक्षणता है, वह इनकी व्यक्तिगत नहीं है, प्रत्युत परमात्माकी ही है। इसलिये परमात्माकी तरफ ही दृष्टि जानी चाहिये।