वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासव:।
इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना॥
वेदानाम्, सामवेद:, अस्मि, देवानाम्, अस्मि, वासव:,
इन्द्रियाणाम्, मन:, च, अस्मि, भूतानाम्, अस्मि, चेतना॥ २२॥
वेदानाम् = वेदोंमें, सामवेद: = सामवेद, अस्मि = हूँ, देवानाम् = देवोंमें, वासव: = इन्द्र, अस्मि = हूँ, इन्द्रियाणाम् = इन्द्रियोंमें, मन: = मन, अस्मि = हूँ, च = और, भूतानाम् = भूतप्राणियोंकी, चेतना = चेतना अर्थात् जीवनीशक्ति, अस्मि = हूँ।
‘मैं वेदों में सामवेद हूँ, और देवताओं का वासव (इन्द्र) हूँ; इन्द्रियों में मैं मन हूँ; और जीवित प्राणियों में चेतना हूँ’।
।।10.22।। व्याख्या–‘वेदानां सामवेदोऽस्मि’–वेदोंकी जो ऋचाएँ स्वरसहित गायी जाती हैं, उनका नाम सामवेद है। सामवेदमें इन्द्ररूपसे भगवान्की स्तुतिका वर्णन है। इसलिये सामवेद भगवान्की विभूति है।
‘देवानामस्मि वासवः’– सूर्य, चन्द्रमा आदि जितने भी देवता हैं, उन सबमें इन्द्र मुख्य है और सबका अधिपति है। इसलिये भगवान्ने उसको अपनी विभूति बताया है।
‘इन्द्रियाणां मनश्चास्मि’ — नेत्र, कान आदि सब इन्द्रियोंमें मन मुख्य है। सब इन्द्रियाँ मनके साथ रहनेसे (मनको साथमें लेकर) ही काम करती हैं। मन साथमें न रहनेसे इन्द्रियाँ अपना काम नहीं करतीं। यदि मनका साथ न हो ते इन्द्रियोंके सामने विषय आनेपर भी विषयोंका ज्ञान नहीं होता। मनमें यह विशेषता भगवान्से ही आयी है। इसलिये भगवान्ने मनको अपनी विभूति बताया है।
‘भूतानामस्मि चेतना’–सम्पूर्ण प्राणियोंकी जो चेतना-शक्ति, प्राणशक्ति है, जिससे मरे हुए आदमीकी अपेक्षा सोये हुए आदमीमें विलक्षणता दीखती है, उसे भगवान्ने अपनी विभूति बताया है।इन विभूतियोंमें जो विशेषता है, वह भगवान्से ही आयी है। इनकी स्वतन्त्र विशेषता नहीं है।