वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतय:।
याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि॥
वक्तुम्, अर्हसि, अशेषेण, दिव्या:, हि, आत्मविभूतय:,
याभि:, विभूतिभि:, लोकान्, इमान्, त्वम्, व्याप्य, तिष्ठसि॥ १६॥
त्वम् = आप, हि = ही (उन), दिव्या: आत्मविभूतय: = अपनी दिव्य विभूतियोंको, अशेषेण = सम्पूर्णतासे, वक्तुम् = कहनेमें, अर्हसि = समर्थ हैं, याभि: = जिन, विभूतिभि: = विभूतियोंके द्वारा (आप), इमान् = इन सब, लोकान् = लोकोंको, व्याप्य = व्याप्त करके, तिष्ठसि = स्थित हैं।
‘निस्सन्देह, आपको अपनी विभूतियाँ बताना शोभा देता है जिनके द्वारा आप इस जगत् को परिपूरित करते हुए विद्यमान हैं’।
।।10.16।। व्याख्या–‘याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि’ — भगवान्ने पहले (सातवें श्लोकमें) यह बात कही थी कि जो मनुष्य मेरी विभूतियोंको और योगको तत्त्वसे जानता है, उसका मेरेमें अटल भक्तियोग हो जाता है। उसे सुननेपर अर्जुनके मनमें आया कि भगवान्में दृढ़ भक्ति होनेका यह बहुत सुगम और श्रेष्ठ उपाय है; क्योंकि भगवान्की विभूतियोंको और योगको तत्त्वसे जाननेपर मनुष्यका मन भगवान्की तरफ स्वाभाविक ही खिंच जाता है और भगवान्में उसकी स्वाभाविक ही भक्ति जाग्रत् हो जाती है। अर्जुन अपना कल्याण चाहते हैं और कल्याणके लिये उनको भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ उपाय दीखती है। इसलिये अर्जुन कहते हैं कि जिन विभूतियोंसे आप सम्पूर्ण लोकोंको व्याप्त करके स्थित हैं, उन अलौकिक, विलक्षण विभूतियोंका विस्तारपूर्वक सम्पूर्णतासे वर्णन कीजिये। कारण कि उनको कहनेमें आप ही समर्थ हैं; आपके सिवाय उन विभूतियोंको और कोई नहीं कह सकता।‘वक्तुमर्हस्यशेषेण’ — आपने पहले (सातवें, नवें और यहाँ दसवें अध्यायके आरम्भमें) अपनी विभूतियाँ बतायीं और उनको जाननेका फल दृढ़ भक्तियोग होना बताया। अतः मैं भी आपकी सब विभूतियोंको जान जाऊँ और मेरा भी आपमें दृढ़ भक्तियोग हो जाय, इसलिये आप अपनी विभूतियोंको पूरी-की-पूरी कह दें, बाकी कुछ न रखें।‘दिव्या ह्यात्मविभूतयः’ — विभूतियोंको दिव्य कहनेका तात्पर्य है कि संसारमें जो कुछ विशेषता दीखती है वह मूलमें दिव्य परमात्माकी ही है, संसारकी नहीं। अतः संसारकी विशेषता देखना भोग है और परमात्माकी विशेषता देखना विभूति है, योग है।