श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥35॥ श्रेयान्, स्वधर्म:, विगुण:, परधर्मात्, स्वनुष्ठितात्स्वधर्मे, निधनम्, श्रेय:, परधर्म:, भयावह:॥ …
Bhagavad Gita 16.5
Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas 16.5।।व्याख्या--'दैवी सम्पद्विमोक्षाय'--मेरेको भगवान्की तरफ ही चलना है -- यह भाव साधकमें जितना स्पष्टरूपसे आ जाता है, उतना ही वह भगवान्के सम्मुख हो जाता है। …
Bhagavad Gita 16.4
Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas ।।16.4।। व्याख्या -- दम्भः -- मान? बड़ाई? पूजा? ख्याति आदि प्राप्त करनेके लिये? अपनी वैसी स्थिति न होनेपर भी वैसी स्थिति दिखानेका नाम …
BG 3.30 मयि सर्वाणि कर्माणि
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा ।निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ॥30॥ मयि, सर्वाणि, कर्माणि, सन्न्यस्य, अध्यात्मचेतसा,निराशी:, निर्मम:, भूत्वा, युध्यस्व, विगतज्वर:॥ …
Bhagavad Gita 16.3
Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas ।।16.3।। व्याख्या--'तेजः'--महापुरुषोंका सङ्ग मिलनेपर उनके प्रभावसे प्रभावित होकर साधारण पुरुष भी दुर्गुण-दुराचारोंका त्याग करके सद्गुण-सदाचारोंमें लग जाते …
BG 3.38 धूमेनाव्रियते वह्निर्
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च ।यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥38॥ धूमेन, आव्रियते, वह्नि:, यथा, आदर्श:, मलेन, च,यथा, उल्बेन, आवृत:, गर्भ:, तथा, तेन, इदम्, आवृतम्॥ ३८॥ यथा = …