स तन्मयो ह्यमृत ईशसंस्थो
ज्ञ: सर्वगो भुवनस्यास्य गोप्ता।
य ईशे अस्य जगतो नित्यमेव
नान्यो हेतुर्विद्यत ईशनाय॥ १७॥
स: हि=वही; तन्मय:=तन्मय; अमृत:=अमृतस्वरूप; ईशसंस्थ:=ईश्वरों (लोकपालों) में भी आत्मरूपसे स्थित; ज्ञ:=सर्वज्ञ; सर्वग:=सर्वत्र परिपूर्ण; (और) अस्य=इस; भुवनस्य=ब्रह्माण्डका; गोप्ता=रक्षक है; य:=जो; अस्य=इस; जगत:=सम्पूर्ण जगत् का; नित्यम्=सदा; एव=ही; ईशे=शासन करता है; (क्योंकि) ईशनाय=इस जगत् पर शासन करनेके लिये; अन्य:=दूसरा कोई भी; हेतु:=हेतु; न=नहीं; विद्यते=है॥ १७॥
व्याख्या—जिनके स्वरूपका पूर्वमन्त्रमें वर्णन हुआ है, वे परब्रह्म परमेश्वर ही इस जगत् के—स्वरूपमें स्थित, अमृतस्वरूप—एकरस हैं; इस जगत्के उत्पत्ति-विनाशरूप परिवर्तनसे उनका परिवर्तन नहीं होता। वे समस्त ईश्वरोंमें—समस्त लोकोंका पालन करनेके लिये नियुक्त किये हुए लोकपालोंमें भी अन्तर्यामीरूपसे स्थित हैं। वे सर्वज्ञ, सर्वत्र परिपूर्ण परमेश्वर ही इस समस्त ब्रह्माण्डकी रक्षा करते हैं; वे ही इस सम्पूर्ण जगत्का सदा यथायोग्य नियन्त्रण और संचालन करते हैं। दूसरा कोई भी इस जगत् पर शासन करनेके लिये उपयुक्त हेतु नहीं प्रतीत होता; क्योंकि दूसरा कोई भी सबपर शासन करनेमें समर्थ नहीं है॥ १७॥
सम्बन्ध—उपर्युक्त परमेश्वरको जानने और पानेके लिये साधनके रूपमें उन्हींकी शरण लेनेका प्रकार बताया जाता है—