यस्तन्तुनाभ इव तन्तुभि: प्रधानजै: स्वभावतो देव एक: स्वमावृणोत् । स नो दधाद्ब्रह्माप्ययम्॥ १०॥
तन्तुभि:=तन्तुओंद्वारा; तन्तुनाभ: इव=मकड़ीकी भाँति; य: एक: देव:=जिस एक देव (परमात्मा) ने; प्रधानजै:=अपनी स्वरूपभूत मुख्य शक्तिसे उत्पन्न अनन्त कार्योंद्वारा; स्वभावत:=स्वभावसे ही; स्वम्=अपनेको; आवृणोत् =आच्छादित कर रखा है; स:=वह परमेश्वर; न:=हमलोगोंको; ब्रह्माप्ययम्=अपने परब्रह्म रूपमें आश्रय; दधात् =दे॥ १०॥
व्याख्या—जिस प्रकार मकड़ी अपनेसे प्रकट किये हुए तन्तुजालसे स्वयं आच्छादित हो जाती है—उसमें अपनेको छिपा लेती है, उसी प्रकार जिन एक देव परमपुरुष परमेश्वरने अपनी स्वरूपभूत मुख्य एवं दिव्य अचिन्त्यशक्तिसे उत्पन्न अनन्त कार्योंद्वारा स्वभावसे ही अपनेको आच्छादित कर रखा है, जिसके कारण संसारी जीव उन्हें देख नहीं पाते, वे सर्वशक्तिमान् सर्वाधार परमात्मा हमलोगोंको सबके परम आश्रयभूत अपने परब्रह्मस्वरूपमें स्थापित करें॥ १०॥