न तस्य कश्चित् पतिरस्ति लोके
न चेशिता नैव च तस्य लिङ्गम्।
स कारणं करणाधिपाधिपो
न चास्य कश्चिज्जनिता न चाधिप:॥ ९॥
लोके=जगत् में; कश्चित् =कोई भी; तस्य=उस परमात्माका; पति:=स्वामी; न=नहीं; अस्ति=है; ईशिता=उसका शासक; च=भी; न=नहीं है; च=और; तस्य=उसका; लिङ्गम्=चिह्नविशेष भी; न एव=नहीं है; स:=वह; कारणम्=सबका परम कारण; (तथा) करणाधिपाधिप:=समस्त करणोंके अधिष्ठाताओंका भी अधिपति है; कश्चित् =कोई भी; न=न; च=तो; अस्य=इसका; जनिता=जनक है; च=और; न=न; अधिप:=स्वामी ही है॥ ९॥
व्याख्या—जगत्में कोई भी उन परमात्माका स्वामी नहीं है। सभी उनके दास और सेवक हैं। उनका शासक—उनपर आज्ञा चलानेवाला भी कोई नहीं है। सब उन्हींकी आज्ञा और प्रेरणाका अनुसरण करते और उनके नियन्त्रणमें रहते हैं। उनका कोई चिह्नविशेष भी नहीं है; क्योंकि वे सर्वत्र परिपूर्ण, निराकार हैं तथा वे सबके परम कारण—कारणोंके भी कारण और समस्त अन्त:करण और इन्द्रियोंके अधिष्ठातृ-देवताओंके भी अधिपति—शासक हैं। इन परब्रह्म परमात्माका न तो कोई जनक—अर्थात् इन्हें उत्पन्न करनेवाला पिता है और न कोई इनका अधिपति ही है। ये अजन्मा, सनातन, सर्वथा स्वतन्त्र और सर्वशक्तिमान् हैं॥ ९॥