स वृक्षकालाकृतिभि: परोऽन्यो
यस्मात् प्रपञ्च: परिवर्ततेऽयम्।
धर्मावहं पापनुदं भगेशं
ज्ञात्वात्मस्थममृतं विश्वधाम॥ ६॥
यस्मात्=जिससे; अयम्=यह; प्रपञ्च:=प्रपञ्च (संसार); परिवर्तते=निरन्तर चलता रहता है; स:=वह (परमात्मा); वृक्षकालाकृतिभि:=इस संसारवृक्ष, काल और आकृति आदिसे; पर:=सर्वथा अतीत; (एवं) अन्य:=भिन्न है; (उस) धर्मावहम्=धर्मकी वृद्धि करनेवाले; पापनुदम्=पापका नाश करनेवाले; भगेशम्=सम्पूर्ण ऐश्वर्यके अधिपति; (तथा) विश्वधाम=समस्त जगत्के आधारभूत परमात्माको; आत्मस्थम्=अपने हृदयमें स्थित; ज्ञात्वा=जानकर; (साधक) अमृतम् [एति]=अमृतस्वरूप परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है॥ ६॥
व्याख्या—जिनकी अचिन्त्यशक्तिके प्रभावसे यह प्रपञ्चरूप संसार निरन्तर घूम रहा है—प्रवाहरूपसे सदा चलता रहता है, वे परमात्मा इस संसारवृक्ष, काल और आकृति आदिसे सर्वथा अतीत और भिन्न हैं अर्थात् वे संसारसे सर्वथा सम्बन्धरहित, कालका भी ग्रास कर जानेवाले एवं आकाररहित हैं; तथापि वे धर्मकी वृद्धि एवं पापका नाश करनेवाले, समस्त ऐश्वर्योंके अधिपति और समस्त जगत्के आधार हैं। यह सम्पूर्ण विश्व उन्हींके आश्रित है, उन्हींकी सत्तासे टिका हुआ है। अन्तर्यामीरूपसे वे हमारे हृदयमें भी हैं। इस प्रकार उन्हें जानकर ज्ञानयोगी उन अमृतस्वरूप परमात्माको प्राप्त हो जाता है॥ ६॥
सम्बन्ध—पहले अध्यायमें जिनका वर्णन आया है, वे ध्यानके द्वारा परमात्माका प्रत्यक्ष करनेवाले महात्मा कहते हैं—