येनावृतं नित्यमिदं हि सर्वं
ज्ञ: कालकालो गुणी सर्वविद्य:।
तेनेशितं कर्म विवर्तते ह
पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखानि चिन्त्यम्॥ २॥
येन=जिस परमेश्वरसे; इदम्=यह; सर्वम्=सम्पूर्ण जगत् ; नित्यम्=सदा; आवृतम्=व्याप्त है; य:=जो; ज्ञ:=ज्ञानस्वरूप परमेश्वर; हि=निश्चय ही; कालकाल:=कालका भी महाकाल; गुणी=सर्वगुणसम्पन्न; (और) सर्ववित् =सबको जाननेवाला है; तेन=उससे; ह=ही; ईशितम्=शासित हुआ; कर्म=यह जगत् रूप कर्म; विवर्तते=विभिन्न प्रकारसे यथायोग्य चल रहा है; (और ये) पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखानि=पृथ्वी, जल, तेज, वायु तथा आकाश भी (उसीके द्वारा शासित होते हैं); [इति]=इस प्रकार; चिन्त्यम्=चिन्तन करना चाहिये॥ २॥
व्याख्या—जिन जगन्नियन्ता जगदाधार परमेश्वरसे यह सम्पूर्ण जगत् सदा—सभी अवस्थाओंमें सर्वथा व्याप्त है, जो कालके भी महाकाल हैं— अर्थात् जो कालकी सीमासे परे हैं, जो ज्ञानस्वरूप चिन्मय परमात्मा सुहृदता आदि समस्त दिव्य गुणोंसे नित्य सम्पन्न हैं, समस्त गुण जिसके स्वरूपभूत और चिन्मय हैं, जो समस्त ब्रह्माण्डोंको भली प्रकारसे जानते हैं, उन्हींका चलाया हुआ यह जगत्-चक्र नियमपूर्वक चल रहा है। वे ही पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—इन पाँचों महाभूतोंपर शासन करते हुए इनको अपना-अपना कार्य करनेकी शक्ति देकर इनसे कार्य करवाते हैं। उनकी शक्तिके बिना ये कुछ भी नहीं कर सकते, यह बात केनोपनिषद्के तीसरे खण्डमें यक्षके आख्यानद्वारा भलीभाँति समझायी गयी है। इस रहस्यको समझकर मनुष्यको उन सर्वशक्तिमान् परमेश्वरका उपर्युक्त भावसे चिन्तन करना चाहिये॥ २॥