नैव स्त्री न पुमानेष न चैवायं नपुंसक:।
यद् यच्छरीरमादत्ते तेन तेन स युज्यते॥ १०॥
एष:=यह जीवात्मा; न=न; एव=तो; स्त्री=स्त्री है; न=न; पुमान्=पुरुष है; च=और; न=न; अयम्=यह; नपुंसक: एव=नपुंसक ही है; स:=वह; यत् यत् =जिस-जिस; शरीरम्=शरीरको; आदत्ते=ग्रहण करता है; तेन तेन=उस-उससे; युज्यते=सम्बद्ध हो जाता है॥ १०॥
व्याख्या—जीवात्मा वास्तवमें न तो स्त्री है, न पुरुष है और न नपुंसक ही है। यह जब जिस शरीरको ग्रहण करता है, उस समय उससे संयुक्त होकर वैसा ही बन जाता है। जो जीवात्मा आज स्त्री है, वही दूसरे जन्ममें पुरुष हो सकता है; जो पुरुष है, वह स्त्री हो सकता है। भाव यह कि ये स्त्री, पुरुष और नपुंसक आदि भेद शरीरको लेकर हैं; जीवात्मा सर्वभेदशून्य है, सारी उपाधियोंसे रहित है॥ १०॥