मा नस्तोके तनये मा न आयुषि मा नो गोषु मा नो अश्वेषु रीरिष:। वीरान्मा नो रुद्र भामितो वधीर्हविष्मन्त: सदमित्त्वा हवामहे॥ २२॥ *
* यह यजुर्वेद अध्याय १६ का सोलहवाँ मन्त्र है। ऋग्वेद मण्डल १०, सूक्त ११४ का आठवाँ मन्त्र है।
रुद्र=हे सबका संहार करनेवाले रुद्रदेव!; [वयम्]=हमलोग; हविष्मन्त:=नाना प्रकारकी भेंट लेकर; सदम्=सदा; इत् =ही; त्वा=तुझे; (रक्षाके लिये) हवामहे=बुलाते रहते हैं; (अत: तू) भामित:=कुपित होकर; मा=न तो; न:=हमारे; तोके=पुत्रोंमें; (और) तनये=पौत्रोंमें; मा=न; न:=हमारी; आयुषि=आयुमें; मा=न; न:=हमारी; गोषु=गौओंमें; (और) मा=न; न:=हमारे; अश्वेषु=घोड़ोंमें ही; रीरिष:=किसी प्रकारकी कमी कर; (तथा) न:=हमारे; वीरान् मा वधी:=वीर पुरुषोंका भी नाश न करें॥ २२॥
व्याख्या—हे सबका संहार करनेवाले रुद्रदेव! हमलोग नाना प्रकारकी भेंट समर्पण करते हुए सदा ही आपको बुलाते रहते हैं। आप ही हमारी रक्षा करनेमें सर्वथा समर्थ हैं; अत: हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि आप हमपर कभी कुपित न हों तथा कुपित होकर हमारे पुत्र और पौत्रोंको, हमारी आयुको—जीवनको तथा हमारे गौ, घोड़े आदि पशुओंको कभी किसी प्रकारकी क्षति न पहुँचायें। हमारे जो वीर—साहसी पुरुष हैं, उनका भी नाश न करें; अर्थात् सब प्रकारसे हमारी और हमारे धन-जनकी रक्षा करें॥ २२॥