अजात इत्येवं कश्चिद् भीरु: प्रपद्यते।
रुद्र यत्ते दक्षिणं मुखं तेन मां पाहि नित्यम्॥ २१॥
रुद्र=हे रुद्र (संहार करनेवाले देव)!; अजात:=तू अजन्मा है; इति एवम्=यों समझकर; कश्चित् =कोई; भीरु:=जन्म-मरणके भयसे डरा हुआ मनुष्य; प्रपद्यते=तेरी शरण लेता है; (मैं भी वैसा ही हूँ, अत:) ते=तेरा; यत् =जो; दक्षिणम्=दाहिना (कल्याणमय); मुखम्=मुख है; तेन=उसके द्वारा; (तू) नित्यम्=सर्वदा; माम् पाहि=मेरी जन्म-मृत्युरूप भयसे रक्षा कर॥ २१॥
व्याख्या—हे रुद्र! अर्थात् सबका संहार करनेवाले परमेश्वर! आप स्वयं अजन्मा हैं, अत: दूसरोंको भी जन्म-मृत्युसे मुक्त कर देना आपका स्वभाव है। यह समझकर कोई जन्म-मरणके भयसे डरा हुआ साधक इस संसारचक्रसे छुटकारा पानेके लिये आपकी शरण लेता है। मैं भी इस संसारचक्रसे छुटकारा पानेके लिये ही आपकी शरणमें आया हूँ; अत: जो आपका दाहिना मुख है, अर्थात् जो आपका परम शान्त कल्याणमय स्वरूप है, उसके द्वारा आप मेरा इस जन्म-मरणरूप महान् भयसे सदाके लिये रक्षा करें। मुझे सदाके लिये इस भयसे मुक्त कर दें॥ २१॥