यदातमस्तन्न दिवा न रात्रि-
र्न सन्न चासञ्छिव एव केवल:।
तदक्षरं तत्सवितुर्वरेण्यं
प्रज्ञा च तस्मात् प्रसृता पुराणी॥ १८॥
यदा=जब; अतम: [स्यात्]=अज्ञानमय अन्धकारका सर्वथा अभाव हो जाता है; तत्*=उस समय (अनुभवमें आनेवाला तत्त्व); न=न; दिवा=दिन है; न=न; रात्रि:=रात है; न=न; सन्=सत् है; च=और; न=न; असन्=असत् है; केवल:=एकमात्र, विशुद्ध; शिव: एव=कल्याणमय शिव ही है; तत् =वह; अक्षरम्=सर्वथा अविनाशी है; तत् =वह; सवितु:=सूर्याभिमानी देवताका भी; वरेण्यम्=उपास्य है; च=तथा; तस्मात् =उसीसे; पुराणी=(यह) पुराना; प्रज्ञा=ज्ञान; प्रसृता=फैला है॥ १८॥
* ‘तत्’ अव्यय पद है, यहाँ ‘तदा’के अर्थमें इसका प्रयोग हुआ है।
व्याख्या—जिस समय अज्ञानरूप अन्धकारका सर्वथा अभाव हो जाता है, उस समय प्रत्यक्ष होनेवाला तत्त्व न दिन है, न रात है। अर्थात् उसे न तो दिनकी भाँति प्रकाशमय कहा जा सकता है और न रातकी भाँति अन्धकारमय ही; क्योंकि वह इन दोनोंसे सर्वथा विलक्षण है, वहाँ ज्ञान-अज्ञानके भेदकी कल्पनाके लिये स्थान नहीं है। वह न सत् है और न असत् है—उसे न तो ‘सत्’ कहना बनता है न ‘असत्’ ही; क्योंकि वह ‘सत्’ और ‘असत्’ नामसे समझे जानेवाले पदार्थोंसे सर्वथा विलक्षण है। एकमात्र कल्याणस्वरूप शिव ही वह तत्त्व हैं। वे सर्वथा अविनाशी हैं। सूर्य आदि समस्त देवताओंके उपास्यदेव हैं। उन्हींसे यह सदासे चला आता हुआ अनादि ज्ञान विस्तारित हुआ है अर्थात् परमात्माको जानने और पानेका साधन अधिकारियोंको परम्परासे प्राप्त होता चला आ रहा है॥ १८॥