स एव काले भुवनस्य गोप्ता
विश्वाधिप: सर्वभूतेषु गूढ:।
यस्मिन् युक्ता ब्रह्मर्षयो देवताश्च
तमेवं ज्ञात्वा मृत्युपाशांश्छिनत्ति॥ १५॥
स: एव=वही; काले=समयपर; भुवनस्य गोप्ता=समस्त ब्रह्माण्डोंकी रक्षा करनेवाला; विश्वाधिप:=समस्त जगत्का अधिपति; (और) सर्वभूतेषु=समस्त प्राणियोंमें; गूढ:=छिपा हुआ है; यस्मिन्=जिसमें; ब्रह्मर्षय:=वेदज्ञ महर्षिगण; च=और; देवता:=देवतालोग भी; युक्ता:=ध्यानद्वारा संलग्न हैं; तम्=उस (परमदेव परमेश्वर) को; एवम्=इस प्रकार; ज्ञात्वा=जानकर; (मनुष्य) मृत्युपाशान्=मृत्युके बन्धनोंको; छिनत्ति=काट डालता है॥ १५॥
व्याख्या—जिनका बार-बार वर्णन किया गया है, वे परमदेव परमेश्वर ही समयपर अर्थात् स्थितिकालमें समस्त ब्रह्माण्डोंकी रक्षा करते हैं तथा वे ही सम्पूर्ण जगत्के अधिपति और समस्त प्राणियोंमें अन्तर्यामीरूपसे छिपे हुए हैं। उन्हींमें वेदके रहस्यको समझनेवाले महर्षिगण और समस्त देवतालोग भी ध्यानके द्वारा संलग्न रहते हैं। सब उन्हींका स्मरण और चिन्तन करके उन्हींमें जुड़े रहते हैं। इस प्रकार उन परमदेव परमेश्वरको जानकर मनुष्य यमराजके समस्त पाशोंको अर्थात् जन्म-मृत्युके कारणभूत समस्त बन्धनोंको काट डालता है। फिर वह कभी प्रकृतिके बन्धनमें नहीं आता, सदाके लिये सर्वथा मुक्त हो जाता है॥ १५॥