सूक्ष्मातिसूक्ष्मं कलिलस्य मध्ये
विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम्।
विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं
ज्ञात्वा शिवं शान्तिमत्यन्तमेति॥ १४॥ *
* यह मन्त्र इसी उपनिषद् (५। १३) में आया है, यहाँ थोड़ा भेद है।
सूक्ष्मातिसूक्ष्मम्=(जो) सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म; कलिलस्य मध्ये=हृदय-गुहारूप गुह्यस्थानके भीतर स्थित; विश्वस्य=अखिल विश्वकी; स्रष्टारम्=रचना करनेवाला; अनेकरूपम्=अनेक रूप धारण करनेवाला; (तथा) विश्वस्य परिवेष्टितारम्=समस्त जगत्को सब ओरसे घेर रखनेवाला है; (उस) एकम्=एक (अद्वितीय); शिवम्=कल्याणस्वरूप महेश्वरको; ज्ञात्वा=जानकर; (मनुष्य) अत्यन्तम्=सदा रहनेवाली; शान्तिम्=शान्तिको; एति=प्राप्त होता है॥ १४॥
व्याख्या—जो परब्रह्म परमात्मा सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म हैं—अर्थात् जो बिना उनकी कृपाके जाने नहीं जाते, जो सबकी हृदय-गुहारूप गुह्यस्थानके भीतर स्थित हैं अर्थात् जो हमारे समीप हैं, जो अखिल विश्वकी रचना करते हैं तथा स्वयं विश्वरूप होकर अनेक रूप धारण किये हुए हैं—यही नहीं, जो निराकाररूपसे समस्त जगत्को सब ओरसे घेरे रहते हैं, उन सर्वोपरि एक— अद्वितीय कल्याणस्वरूप महेश्वरको जानकर मनुष्य सदा रहनेवाली असीम, अविनाशी और अतिशय शान्तिको प्राप्त कर लेता है, क्योंकि वह महापुरुष इस अशान्त जगत्-प्रपञ्चसे सर्वथा सम्बन्धरहित एवं उपरत हो जाता है॥ १४॥