यो देवानां प्रभवश्चोद्भवश्च
विश्वाधिपो रुद्रो महर्षि:।
हिरण्यगर्भं पश्यत जायमानं
स नो बुद्धॺा शुभया संयुनक्तु॥ १२॥
य:=जो; रुद्र:=रुद्र; देवानाम्=इन्द्रादि देवताओंको; प्रभव:=उत्पन्न करनेवाला; च=और; उद्भव:=बढ़ानेवाला है; च=तथा; (जो) विश्वाधिप:=सबका अधिपति; महर्षि:=(और) महान् ज्ञानी (सर्वज्ञ) है; (जिसने सबसे पहले) जायमानम्=उत्पन्न हुए; हिरण्यगर्भम्=हिरण्यगर्भको; पश्यत=देखा था; स:=वह परमदेव परमेश्वर; न:=हमलोगोंको; शुभया बुद्धॺा=शुभ बुद्धिसे; संयुनक्तु=संयुक्त करें॥ १२॥
व्याख्या—सबको अपने शासनमें रखनेवाले जो रुद्ररूप परमेश्वर इन्द्रादि समस्त देवताओंको उत्पन्न करते और बढ़ाते हैं तथा जो सबके अधिपति और महान् ज्ञानसम्पन्न (सर्वज्ञ) हैं, जिन्होंने सृष्टिके आदिमें सबसे पहले उत्पन्न हुए हिरण्यगर्भको देखा था, अर्थात् जो ब्रह्माके भी पूर्ववर्ती हैं, वे परमदेव परमात्मा हमलोगोंको शुभ बुद्धिसे संयुक्त करें, जिससे हम उनकी ओर बढ़कर उन्हें प्राप्त कर सकें। शुभ बुद्धि वही है, जो जीवको परम कल्याणरूप परमात्माकी ओर लगाये। गायत्री-मन्त्रमें भी इसी बुद्धिके लिये प्रार्थना की गयी है। पहले इसी उपनिषद् (३। ४) में यह मन्त्र आ चुका है॥ १२॥