यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येको
यस्मिन्निदं स च वि चैति सर्वम्।
तमीशानं वरदं देवमीडॺं
निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति॥ ११॥
य:=जो; एक:=अकेला ही; योनिम् योनिम् अधितिष्ठति=प्रत्येक योनिका अधिष्ठाता हो रहा है; यस्मिन्=जिसमें; इदम्=यह; सर्वम्=समस्त जगत् ; समेति=प्रलयकालमें विलीन हो जाता है; च=और; व्येति च=सृष्टिकालमें विविध रूपोंमें प्रकट भी हो जाता है; तम्=उस; ईशानम्=सर्वनियन्ता; वरदम्=वरदायक; ईडॺम्=स्तुति करनेयोग्य; देवम्=परमदेव परमेश्वरको; निचाय्य=तत्त्वसे जानकर; (मनुष्य) अत्यन्तम्=निरन्तर बनी रहनेवाली; इमाम्=इस (मुक्तिरूप); शान्तिम्=परम शान्तिको; एति=प्राप्त हो जाता है॥ ११॥
व्याख्या—परब्रह्म परमेश्वर प्रत्येक योनिके एकमात्र अध्यक्ष हैं— जगत्में जितने प्रकारके कारण माने जाते हैं, उन सबके अधिष्ठाता हैं। उनमें किसी कार्यको उत्पन्न करनेकी शक्ति उन्हीं सर्वकारण परमात्माकी है और उन्हींकी अध्यक्षतामें वे उन-उन कार्योंको उत्पन्न करते हैं। वे परमेश्वर ही उन सबपर शासन करते हैं—उनकी यथायोग्य व्यवस्था करते हैं। यह समस्त जगत् प्रलयके समय उनमें विलीन हो जाता है तथा पुन: सृष्टिकालमें उन्हींसे विविध रूपोंमें उत्पन्न हो जाता है। उन सर्वनियन्ता, वरदायक, एकमात्र स्तुति करनेयोग्य परमदेव, सर्वसुहृद्, सर्वेश्वर परमात्माको जानकर यह जीव निरन्तर बनी रहनेवाली परमनिर्वाणरूप शान्तिको प्राप्त हो जाता है। गीतामें इसका शाश्वती शान्ति (गीता ९। ३१), परा शान्ति (गीता १८। ६२) आदि नामोंसे भी वर्णन आता है॥ ११॥