मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्।
तस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत्॥ १०॥
मायाम्=माया; तु=तो; प्रकृतिम्=प्रकृतिको; विद्यात् =समझना चाहिये; तु=और; मायिनम्=मायापति; महेश्वरम्=महेश्वरको समझना चाहिये; तस्य तु=उसीके; अवयवभूतै:=अङ्गभूत कारण-कार्य-समुदायसे; इदम्=यह; सर्वम्=सम्पूर्ण; जगत् =जगत् ; व्याप्तम्=व्याप्त हो रहा है॥ १०॥
व्याख्या—इस प्रकरणमें जिसका मायाके नामसे वर्णन हुआ है, वह तो भगवान्की शक्तिरूपा प्रकृति है और उस माया नामसे कही जानेवाली शक्तिरूपा प्रकृतिका अधिपति परब्रह्म परमात्मा महेश्वर है; इस प्रकार इन दोनोंको अलग-अलग समझना चाहिये। उस परमेश्वरकी शक्तिरूपा प्रकृतिके ही अङ्गभूत कारण-कार्य-समुदायसे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त हो रहा है॥ १०॥