छन्दांसि यज्ञा: क्रतवो व्रतानि
भूतं भव्यं यच्च वेदा वदन्ति।
अस्मान्मायी सृजते विश्वमेतत्
तस्मिंश्चान्यो मायया संनिरुद्ध:॥ ९॥
छन्दांसि=छन्द; यज्ञा:=यज्ञ; क्रतव:=क्रतु (ज्योतिष्टोम आदि विशेष यज्ञ); व्रतानि=नाना प्रकारके व्रत; च=तथा; यत् =और भी जो कुछ; भूतम्=भूत; भव्यम्=भविष्य एवं वर्तमानरूपसे; वेदा:=वेद; वदन्ति=वर्णन करते हैं; एतत् विश्वम्=इस सम्पूर्ण जगत् को; मायी=प्रकृतिका अधिपति परमेश्वर; अस्मात् =इस (पहले बताये हुए महाभूतादि तत्त्वोंके समुदाय) से; सृजते=रचता है; च=तथा; अन्य:=दूसरा (जीवात्मा); तस्मिन्=उस प्रपञ्चमें; मायया=मायाके द्वारा; संनिरुद्ध:=भलीभाँति बँधा हुआ है॥ ९॥
व्याख्या—जो समस्त वेदमन्त्र रूप छन्द, यज्ञ, क्रतु अर्थात् ज्योतिष्टोमादि विशेष यज्ञ, नाना प्रकारके व्रत अर्थात् शुभकर्म, सदाचार और उनके नियम हैं तथा और भी जो कुछ भूत, भविष्य, वर्तमान पदार्थ हैं, जिनका वर्णन वेदोंमें पाया जाता है—इन सबको वे प्रकृतिके अधिष्ठाता परमेश्वर ही अपने अंशभूत इस पहले बताये हुए पञ्चभूत आदि तत्त्वसमुदायसे रचते हैं; इस प्रकार रचे हुए उस जगत्में अन्य अर्थात् पहले बताये हुए ज्ञानी महापुरुषोंसे भिन्न जीवसमुदाय मायाके द्वारा बँधा हुआ है। जबतक वह अपने स्वामी परमदेव परमेश्वरको साक्षात् नहीं कर लेता, तबतक उसका इस प्रकृतिसे छुटकारा नहीं हो सकता; अत: मनुष्यको उन परमात्माको जानने और पानेकी उत्कट अभिलाषा रखनी चाहिये॥ ९॥