ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्
यस्मिन् देवा अधि विश्वे निषेदु:।
यस्तं न वेद किमृचा करिष्यति
य इत् तद् विदुस्त इमे समासते॥ ८॥ *
* यह मन्त्र ऋग्वेद मण्डल १ सू० १६४ का उनचालीसवाँ है तथा अथर्ववेद (९। १५। १८) में भी है।
यस्मिन्=जिसमें; विश्वे=समस्त; देवा:=देवगण; अधि=भलीभाँति; निषेदु:=स्थित हैं; [तस्मिन्]=उस; अक्षरे=अविनाशी; परमे व्योमन्=परम व्योम (परम धाम)में; ऋच:=सम्पूर्ण वेद स्थित हैं; य:=जो मनुष्य; तम्=उसको; न=नहीं; वेद=जानता; [स:]=वह; ऋचा=वेदोंके द्वारा; किम्=क्या; करिष्यति=सिद्ध करेगा; इत् =परंतु; ये=जो; तत्=उसको; विदु:=जानते हैं; ते=वे तो; इमे=ये; समासते=सम्यक् प्रकारसे उसीमें स्थित हैं॥ ८॥
व्याख्या—परब्रह्म परमेश्वरके जिस अविनाशी दिव्य चेतन परम आकाशस्वरूप परमधामसे समस्त देवगण अर्थात् उन परमात्माके पार्षदगण उन परमेश्वरकी सेवा करते हुए निवास करते हैं, वहीं समस्त वेद भी पार्षदोंके रूपमें मूर्तिमान् होकर भगवान्की सेवा करते हैं। जो मनुष्य उस परमधाममें रहनेवाले परब्रह्म पुरुषोत्तमको नहीं जानता और इस रहस्यको भी नहीं जानता कि समस्त वेद उन परमात्माकी सेवा करनेवाले उन्हींके अङ्गभूत पार्षद हैं, वह वेदोंके द्वारा अपना क्या प्रयोजन सिद्ध करेगा? अर्थात् कुछ सिद्ध नहीं कर सकेगा। परंतु जो उन परमात्माको तत्त्वसे जान लेते हैं, वे तो उस परमधाममें ही सम्यक् प्रकारसे स्थित रहते हैं, अर्थात् वहाँसे कभी नहीं लौटते॥ ८॥