समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नो-
ऽनीशया शोचति मुह्यमान:।
जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीश-
मस्य महिमानमिति वीतशोक:॥ ७॥
समाने वृक्षे=पूर्वोक्त शरीररूप एक ही वृक्षपर रहनेवाला; पुरुष:=जीवात्मा; निमग्न:=गहरी आसक्तिमें डूबा हुआ है; (अत:) अनीशया=असमर्थ होनेके कारण (दीनतापूर्वक); मुह्यमान:=मोहित हुआ; शोचति=शोक करता रहता है; यदा=जब (यह भगवान्की अहैतुकी दयासे); जुष्टम्=भक्तोंद्वारा नित्य सेवित; अन्यम्=अपनेसे भिन्न; ईशम्=परमेश्वरको; (और) अस्य=उसकी; महिमानम्=आश्चर्यमयी महिमाको; पश्यति=प्रत्यक्ष देख लेता है; इति=तब; वीतशोक:=सर्वथा शोकरहित; [भवति]=हो जाता है॥ ७॥
व्याख्या—पहले बतलाये हुए इस शरीररूप एक ही वृक्षपर हृदयरूप घोंसलेमें परमात्माके साथ रहनेवाला यह जीवात्मा जबतक अपने साथ रहनेवाले परम सुहृद् परमेश्वरकी ओर नहीं देखता, इस शरीरमें ही आसक्त होकर मोहमें निमग्न रहता है, अर्थात् शरीरमें अत्यन्त ममता करके उसके द्वारा भोगोंका उपभोग करनेमें ही रचा-पचा रहता है, तबतक असमर्थता और दीनतासे मोहित हुआ नाना प्रकारके दु:खोंको भोगता रहता है। जब कभी इसपर भगवान्की अहैतुकी दया होती है, तब यह अपनेसे भिन्न, अपने ही साथ रहनेवाले, परम सुहृद्, परम प्रिय भगवान्को पहचान पाता है। जो भक्तजनोंद्वारा निरन्तर सेवित हैं, उन परमेश्वरको तथा उनकी आश्चर्यमयी महिमाको, जो जगत्में सर्वत्र भिन्न-भिन्न प्रकारसे प्रकट हो रही है, जब यह देख लेता है, उस समय तत्काल ही सर्वथा शोकरहित हो जाता है। मुण्डक० ३। १। २ में भी यह मन्त्र इसी रूपमें आया है॥ ७॥