द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया
समानं वृक्षं परिषस्वजाते।
तयोरन्य: पिप्पलं स्वाद्वत्त्य-
नश्नन्नन्यो अभिचाकशीति॥ ६॥ *
* यह मन्त्र अथर्ववेद काण्ड ९ सूक्त १४ का २० वाँ है तथा ऋग्वेद मण्डल १ सूक्त १६४ का २० वाँ है।
सयुजा=सदा साथ रहनेवाले; (तथा) सखाया=परस्पर सख्यभाव रखनेवाले; द्वा=दो; सुपर्णा=पक्षी (जीवात्मा एवं परमात्मा); समानम्=एक ही; वृक्षम् परिषस्वजाते=वृक्ष (शरीर)का आश्रय लेकर रहते हैं; तयो:=उन दोनोंमेंसे; अन्य:=एक (जीवात्मा) तो; पिप्पलम्=उस वृक्षके फलों (कर्मफलों) को; स्वादु=स्वाद ले-लेकर; अत्ति=खाता है; अन्य:=(किंतु) दूसरा (ईश्वर); अनश्नन्=उनका उपभोग न करता हुआ; अभिचाकशीति=केवल देखता रहता है॥ ६॥
व्याख्या—जिस प्रकार गीता आदिमें जगत्का अश्वत्थ-वृक्षके रूपमें वर्णन किया गया है, उसी प्रकार इस मन्त्रमें शरीरको अश्वत्थ-वृक्षका और जीवात्मा तथा परमात्माको पक्षियोंका रूप देकर वर्णन किया गया है। इसी प्रकार कठोपनिषद् में जीवात्मा और परमात्माको गुहामें प्रविष्ट छाया और धूपके रूपमें बताकर वर्णन किया गया है (कठ १। ३। १)। दोनों जगहका भाव प्राय: एक ही है। यहाँ मन्त्रका सारांश यह है कि यह मनुष्य-शरीर मानो एक पीपलका वृक्ष है। ईश्वर और जीव—ये दोनों सदा साथ रहनेवाले दो मित्र मानो दो पक्षी हैं। ये दोनों इस शरीररूप वृक्षमें एक साथ एक ही हृदयरूप घोंसलेमें निवास करते हैं। शरीरमें रहते हुए प्रारब्धानुसार जो सुख-दु:खरूप कर्मफल प्राप्त होते हैं, वे ही मानो इस पीपलके फल हैं। इन फलोंको जीवात्मारूप एक पक्षी तो स्वादपूर्वक खाता है। अर्थात् हर्ष-शोकका अनुभव करते हुए कर्मफलको भोगता है। दूसरा ईश्वररूप पक्षी इन फलोंको खाता नहीं, केवल देखता रहता है अर्थात् इस शरीरमें प्राप्त हुए सुख-दु:खोंको वह भोगता नहीं, केवल उनका साक्षी बना रहता है। परमात्माकी भाँति यदि जीवात्मा भी इनका द्रष्टा बन जाय तो फिर उसका इनसे कोई सम्बन्ध न रह जाय। ऐसे ही जीवात्माके सम्बन्धमें पिछले मन्त्रमें यह कहा गया है कि वह प्रकृतिका उपभोग कर चुकनेके बाद उसे नि:सार समझकर उसका परित्याग कर देता है, उससे मुँह मोड़ लेता है। उसके लिये फिर प्रकृति अर्थात् जगत्की सत्ता ही नहीं रह जाती। फिर तो वह और उसका मित्र—दो ही रह जाते हैं और परस्पर मित्रताका आनन्द लूटते हैं। यही इस मन्त्रका तात्पर्य मालूम होता है। मुण्डक० ३। १। १ में भी यह मन्त्र इसी रूपमें आया है॥ ६॥