वेदाहमेतमजरं पुराणं
सर्वात्मानं सर्वगतं विभुत्वात्।
जन्मनिरोधं प्रवदन्ति यस्य
ब्रह्मवादिनो हि प्रवदन्ति नित्यम्॥ २१॥
ब्रह्मवादिन:=वेदके रहस्यका वर्णन करनेवाले महापुरुष; यस्य=जिसके; जन्मनिरोधम्=जन्मका अभाव; प्रवदन्ति=बतलाते हैं; [यम्]=तथा जिसको; नित्यम्=नित्य; प्रवदन्ति=बतलाते हैं; एतम्=इस; विभुत्वात् =व्यापक होनेके कारण; सर्वगतम्=सर्वत्र विद्यमान; सर्वात्मानम्=सबके आत्मा; अजरम्=जरा, मृत्यु आदि विकारोंसे रहित; पुराणम्=पुराणपुरुष परमेश्वरको; अहम्=मैं; वेद=जानता हूँ॥ २१॥
व्याख्या—परमात्माको प्राप्त हुए महात्माका कहना है कि ‘वेदके रहस्यका वर्णन करनेवाले महापुरुष जिन्हें जन्मरहित तथा नित्य बताते हैं, व्यापक होनेके कारण जो सर्वत्र विद्यमान हैं—जिनसे कोई भी स्थान खाली नहीं है, जो जरा-मृत्यु आदि समस्त विकारोंसे सर्वथा रहित हैं और सबके आदि—पुराणपुरुष हैं, उन सबके आत्मा—अन्तर्यामी परब्रह्म परमेश्वरको मैं जानता हूँ’॥ २१॥