अपाणिपादो जवनो ग्रहीता
पश्यत्यचक्षु: स शृणोत्यकर्ण:।
स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता
तमाहुरग्रॺं पुरुषं महान्तम्॥ १९॥
स:=वह परमात्मा; अपाणिपाद:=हाथ-पैरोंसे रहित होकर भी; ग्रहीता=समस्त वस्तुओंको ग्रहण करनेवाला; (तथा) जवन:=वेगपूर्वक सर्वत्र गमन करनेवाला है; अचक्षु:=आँखोंके बिना ही; पश्यति=वह सब कुछ देखता है; (और) अकर्ण:=कानोंके बिना ही; शृणोति=सब कुछ सुनता है; स:=वह; वेद्यम्=जो कुछ भी जाननेमें आनेवाली वस्तुएँ हैं, उन सबको; वेत्ति=जानता है; च=परंतु; तस्य वेत्ता=उसको जाननेवाला; (कोई) न अस्ति=नहीं है; तम्=(ज्ञानी पुरुष) उसे; महान्तम्=महान्; अग्रॺम्=आदि; पुरुषम्=पुरुष; आहु:=कहते हैं॥ १९॥
व्याख्या—जिनका प्रकरण चल रहा है, वे परब्रह्म परमात्मा हाथोंसे रहित होनेपर भी सब जगह समस्त वस्तुओंको ग्रहण कर लेते हैं तथा पैरोंसे रहित होकर भी बड़े वेगसे इच्छानुसार सर्वत्र गमनागमन करते हैं। आँखोंसे रहित होकर भी सब जगह सब कुछ देखते हैं, कानोंसे रहित होकर भी सब जगह सब कुछ सुनते हैं। वे समस्त जाननेयोग्य और जाननेमें आनेवाले जड-चेतन पदार्थोंको भलीभाँति जानते हैं, परंतु उनको जाननेवाला कोई नहीं है। जो सबको जाननेवाले हैं, उन्हें भला कौन जान सकता है। उनके विषयमें ज्ञानी महापुरुष कहते हैं कि वे सबके आदि, पुरातन, महान् पुरुष हैं॥ १९॥