सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्।
सर्वस्य प्रभुमीशानं सर्वस्य शरणं बृहत्॥ १७॥
(जो परम पुरुष परमात्मा) सर्वेन्द्रियविवर्जितम्=समस्त इन्द्रियोंसे रहित होनेपर भी; सर्वेन्द्रियगुणाभासम्=समस्त इन्द्रियोंके विषयोंको जाननेवाला है; (तथा) सर्वस्य=सबका; प्रभुम्=स्वामी; सर्वस्य=सबका; ईशानम्=शासक; (और) बृहत् =सबसे बड़ा; शरणम्=आश्रय है॥ १७॥
व्याख्या—जो सर्वशक्तिमान् परम पुरुष परमात्मा समस्त इन्द्रियोंसे रहित—देहेन्द्रियादि-भेदसे शून्य होनेपर भी समस्त इन्द्रियोंके विषयोंको जानते हैं तथा सबके स्वामी, परम समर्थ, सबका शासन करनेवाले और जीवके लिये सबसे बड़े आश्रय हैं, मनुष्यको सर्वतोभावसे उन्हींकी शरण ग्रहण करनी चाहिये। यही मनुष्य-शरीरका अच्छे-से-अच्छा उपयोग है। इस मन्त्रका पूर्वार्द्ध गीतामें ज्यों-का-त्यों आया है (१३। १४)॥ १७॥