सहस्रशीर्षा पुरुष: सहस्राक्ष: सहस्रपात्।
स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्॥ १४॥ *
* यह यजुर्वेदका ३१।१,२, ऋग्वेदका १०।९०।१,२ तथा अथर्ववेदका १९। ६। १,४ मन्त्र है।
पुरुष:=वह परम पुरुष; सहस्रशीर्षा=हजारों सिरवाला; सहस्राक्ष:=हजारों आँखवाला; सहस्रपात् =(और) हजारों पैरवाला; स:=वह; भूमिम्=समस्त जगत् को; विश्वत:=सब ओरसे; वृत्वा=घेरकर; दशाङ्गुलम् अति=नाभिसे दस अङ्गुल ऊपर (हृदयमें); अतिष्ठत् =स्थित है॥ १४॥
व्याख्या—उन परमपुरुष परमेश्वरके हजारों सिर, हजारों आँखें और हजारों पैर हैं अर्थात् सब अवयवोंसे रहित होनेपर भी उनके सिर, आँख और पैर आदि सभी अङ्ग अनन्त और असंख्य हैं। वे सर्वशक्तिमान् परमेश्वर समस्त जगत्को सब ओरसे घेरकर सर्वत्र व्याप्त हुए ही नाभिसे दस अङ्गुल ऊपर हृदयाकाशमें स्थित हैं। वे सर्वव्यापी और महान् होते हुए ही हृदयरूप एकदेशमें स्थित हैं। भाव यह कि वे अनेक विरुद्ध धर्मोंके आश्रय हैं॥ १४॥