अङ्गुष्ठमात्र: पुरुषोऽन्तरात्मा
सदा जनानां हृदये संनिविष्ट:।
हृदा मन्वीशो मनसाभिक्लृप्तो
य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति॥ १३॥
अङ्गुष्ठमात्र:=(यह) अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला; अन्तरात्मा=अन्तर्यामी; पुरुष:=परम पुरुष (पुरुषोत्तम); सदा=सदा ही; जनानाम्=मनुष्योंके; हृदये=हृदयमें; संनिविष्ट:=सम्यक् प्रकारसे स्थित है; मन्वीश:=मनका स्वामी है; (तथा) हृदा=निर्मल हृदय; (और) मनसा=विशुद्ध मनसे; अभिक्लृप्त:=ध्यानमें लाया हुआ (प्रत्यक्ष होता है); ये=जो; एतत् =इस परब्रह्म परमेश्वरको; विदु:=जान लेते हैं; ते=वे; अमृता:=अमर; भवन्ति=हो जाते हैं॥ १३॥
व्याख्या—अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाले अन्तर्यामी परमपुरुष परमेश्वर सदा ही मनुष्योंके हृदयमें सम्यक् प्रकारसे स्थित हैं और मनके स्वामी हैं तथा निर्मल हृदय और विशुद्ध मनके द्वारा ध्यानमें लाये जाकर प्रत्यक्ष होते हैं; जो साधक इन परब्रह्म परमेश्वरको जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं, अर्थात् सदाके लिये जन्म-मरणसे छूट जाते हैं—अमृतस्वरूप बन जाते हैं। यहाँ परमात्माको अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला इसलिये बताया गया है कि मनुष्यका हृदय अँगूठेके नापका होता है और वही परमात्माकी उपलब्धिका स्थान है। ब्रह्मसूत्रमें भी इस विषयपर विचार करके यही निश्चय किया गया है (ब्र० सू० १। ३। २४-२५)॥ १३॥