महान् प्रभुर्वै पुरुष: सत्त्वस्यैष प्रवर्तक:।
सुनिर्मलामिमां प्राप्तिमीशानो ज्योतिरव्यय:॥ १२॥
वै=निश्चय ही; एष:=यह; महान्=महान्; प्रभु:=समर्थ; ईशान:=सबपर शासन करनेवाला; अव्यय:=अविनाशी; (एवं) ज्योति:=प्रकाशस्वरूप; पुरुष:=परमपुरुष पुरुषोत्तम; इमाम् सुनिर्मलाम् प्राप्तिम् (प्रति)=अपनी प्राप्तिरूप इस अत्यन्त निर्मल लाभकी ओर; सत्त्वस्य प्रवर्तक:=अन्त:करणको प्रेरित करनेवाला है॥ १२॥
व्याख्या—निश्चय ही ये सबपर शासन करनेवाले, महान् प्रभु तथा अविनाशी और प्रकाशस्वरूप परम पुरुष पुरुषोत्तम पहले बताये हुए इस परम निर्मल लाभके प्रति अर्थात् अपने आनन्दमय विशुद्ध स्वरूपकी प्राप्तिकी ओर मनुष्यके अन्त:करणको प्रेरित करते हैं, हरेक मनुष्यको ये अपनी ओर आकर्षित करते हैं; तथापि यह मूर्ख जीव सब प्रकारका सुयोग पाकर भी उनकी प्रेरणाके अनुसार उनकी प्राप्तिके लिये तत्परतासे चेष्टा नहीं करता, इसी कारण मारा-मारा फिरता है॥ १२॥