यस्मात् परं नापरमस्ति किञ्चिद्
यस्मान्नाणीयो न ज्यायोऽस्ति कश्चित् ।
वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येक-
स्तेनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वम्॥ ९॥
यस्मात् परम्=जिससे श्रेष्ठ; अपरम्=दूसरा; किञ्चित् =कुछ भी; न=नहीं; अस्ति=है; यस्मात् =जिससे (बढ़कर); कश्चित् =कोई भी; न=न तो; अणीय:= अधिक सूक्ष्म; न=और न; ज्याय:=महान् ही; अस्ति=है; एक:=(जो) अकेला ही; वृक्ष: इव=वृक्षकी भाँति; स्तब्ध:=निश्चलभावसे; दिवि=प्रकाशमय आकाशमें; तिष्ठति=स्थित है; तेन पुरुषेण=उस परमपुरुष पुरुषोत्तमसे; इदम्=यह; सर्वम्=सम्पूर्ण जगत् ; पूर्णम्=परिपूर्ण है॥ ९॥
व्याख्या—उन परमदेव परमेश्वरसे श्रेष्ठ दूसरा कुछ भी नहीं है, वे सर्वश्रेष्ठ हैं। जितने भी सूक्ष्म तत्त्व हैं, उन सबसे अधिक सूक्ष्म वे ही हैं। उनसे अधिक सूक्ष्म कोई भी नहीं है। इसीसे वे छोटे-से-छोटे जीवके शरीरमें प्रविष्ट होकर स्थित हैं। इसी प्रकार जितने भी महान् व्यापक तत्त्व हैं, उन सबसे महान्— अधिक व्यापक वे परब्रह्म हैं; उनसे बड़ा—उनसे अधिक व्यापक कोई भी नहीं है। इसीसे वे प्रलयकालमें सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको अपने अंदर लीन कर लेते हैं। जो अकेले ही वृक्षकी भाँति निश्चलभावसे परम-धामरूप प्रकाशमय दिव्य आकाशमें स्थित हैं, उन परब्रह्म परमात्मासे यह समस्त जगत् व्याप्त है—वे परम पुरुष परमेश्वर ही निराकाररूपसे सारे जगत्में परिपूर्ण हैं॥ ९॥