वेदाहमेतं पुरुषं महान्त-
मादित्यवर्णं तमस: परस्तात्।
तमेव विदित्वाति मृत्युमेति
नान्य: पन्था विद्यतेऽयनाय॥ ८॥ *
* यह यजुर्वेद अध्याय ३१का अठारहवाँ मन्त्र है।
तमस: परस्तात् =अविद्यारूप अन्धकारसे अतीत; (तथा) आदित्यवर्णम्= सूर्यकी भाँति स्वयंप्रकाशस्वरूप; एतम्=इस; महान्तम् पुरुषम्=महान् पुरुष (परमेश्वर) को; अहम् वेद=मैं जानता हूँ; तम्=उसको; विदित्वा=जानकर; एव=ही; (मनुष्य) मृत्युम्=मृत्युको; अत्येति(अति+एति)=उल्लङ्घन कर जाता है; अयनाय=(परमपदकी) प्राप्तिके लिये; अन्य:=दूसरा; पन्था:=मार्ग; न=नहीं; विद्यते=है॥ ८॥
व्याख्या—कोई ज्ञानी महापुरुष कहता है—इन महान्से भी महान् परम पुरुषोत्तमको मैं जानता हूँ। वे अविद्यारूप अन्धकारसे सर्वथा अतीत हैं तथा सूर्यकी भाँति स्वयंप्रकाशस्वरूप हैं। उनको जानकर ही मनुष्य मृत्युका उल्लङ्घन करनेमें—इस जन्म-मृत्युके बन्धनसे सदाके लिये छुटकारा पानेमें समर्थ होता है। परमपदकी प्राप्तिके लिये इसके सिवा दूसरा कोई मार्ग अर्थात् उपाय नहीं है॥ ८॥