यामिषुं गिरिशन्त हस्ते बिभर्ष्यस्तवे।
शिवां गिरित्र तां कुरु मा हिॸसी: पुरुषं जगत्॥ ६॥ *
* यह यजुर्वेद अध्याय १६का तीसरा मन्त्र है।
गिरिशन्त=हे गिरिशन्त!; याम्=जिस; इषुम्=बाणको; अस्तवे=फेंकनेके लिये; (तू) हस्ते=हाथमें; बिभर्षि=धारण किये हुए है; गिरित्र=हे गिरिराज हिमालयकी रक्षा करनेवाले देव!; ताम्=उस बाणको; शिवाम्=कल्याणमय; कुरु=बना ले; पुरुषम्=जीवसमुदायरूप; जगत् =जगत् को; मा हिंसी:=नष्ट न कर (कष्ट न दे)॥ ६॥
व्याख्या—हे गिरिशन्त—हे कैलासवासी सुखदायक परमेश्वर! जिस बाणको फेंकनेके लिये आपने हाथमें ले रखा है, हे गिरिराज हिमालयकी रक्षा करनेवाले! आप उस बाणको कल्याणमय बना लें—उसकी क्रूरताको नष्ट करके उसे शान्तिमय बना लें। इस जीवसमुदायरूप जगत्का विनाश न करें—इसको कष्ट न दें॥ ६॥