विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो
विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात्।
सं बाहुभ्यां धमति सं पतत्रै-
र्द्यावाभूमी जनयन् देव एक:॥ ३॥ *
* यजुर्वेद अध्याय १७का उन्नीसवाँ और (अथर्व० १३। २६) मन्त्र इसी प्रकार है तथा ऋ० १०। ८१। ३ भी इसी प्रकार है।
विश्वतश्चक्षु:=सब जगह आँखवाला; उत=तथा; विश्वतोमुख:=सब जगह मुखवाला; विश्वतोबाहु:=सब जगह हाथवाला; उत=और; विश्वतस्पात् =सब जगह पैरवाला; द्यावाभूमी जनयन्=आकाश और पृथ्वीकी सृष्टि करनेवाला; [स:]=वह; एक:=एकमात्र; देव:=देव (परमात्मा); बाहुभ्याम्=मनुष्य आदि जीवोंको दो-दो हाथोंसे; संधमति=युक्त करता है (तथा); पतत्रै:=(पक्षी-पतंग आदिको) पाँखोंसे; सं [धमति]=युक्त करता है॥ ३॥
व्याख्या—वे परमेश्वर एक हैं; फिर भी उनकी सब जगह आँखें हैं, सब जगह मुख हैं, सब जगह हाथ हैं और सब जगह पैर हैं। भाव यह कि वे सम्पूर्ण लोकोंमें स्थित समस्त जीवोंके कर्म और विचारोंको तथा समस्त घटनाओंको अपनी दिव्य शक्तिद्वारा निरन्तर देखते रहते हैं, कोई भी बात उनसे छिपी नहीं रहती। उनका भक्त उनको जहाँ कहीं भोजनके योग्य वस्तु समर्पित करता है, उसे वे वहीं भोग लगा सकते हैं। वे सब जगह प्रत्येक वस्तुको एक साथ ग्रहण करनेमें और अपने आश्रित जनोंके संकटका नाश करके उनकी रक्षा करनेमें समर्थ हैं तथा जहाँ कहीं उनके भक्त उन्हें बुलाना चाहें, वहीं वे एक साथ पहुँच सकते हैं। संसारमें ऐसा कोई स्थान नहीं है, जहाँ उनकी ये शक्तियाँ विद्यमान न हों। आकाशसे लेकर पृथ्वीतक समस्त लोकोंकी रचना करनेवाले एक ही परमदेव परमेश्वर मनुष्य आदि प्राणियोंको दो-दो भुजाओंसे और पक्षियोंको पाँखोंसे युक्त करते हैं। भाव यह कि वे समस्त प्राणियोंको आवश्यकतानुसार भिन्न-भिन्न शक्तियों एवं साधनोंसे सम्पन्न करते हैं। यहाँ भुजा और पाँखोंका कथन उपलक्षणमात्र है। इससे यह समझ लेना चाहिये कि समस्त प्राणियोंमें जो कुछ भी शक्ति है, वह सब परमात्माकी ही दी हुई है॥ ३॥